Friday, November 16, 2012

बालदर्शन – गिजुभाई बधेका






बालदर्शन – गिजुभाई बधेका

1 – बालक


बालक माता–पिता की आत्मा है।

बालक घर का आभूषण है।

बालक आँगन की शोभा है।

बालक कुल का दीपक है।

बालक तो हमारे जीवन–सुख की प्रफुल्ल और प्रसन्न खिलती हुई कली है।

2 – बालक की देन


आपके शोक को कौन भुलाता है?

अपनी थकान को कौन मिटाता है?

आपको बाँझपन से कौन बचाता है?

आपके घर को किलकारियों से कौन भरता है?

आपकी हँसी को कौन कायम रखता है?

बालक!

प्रभु को पाने के लिये बालक की पूजा कीजिए।

3 – क्रांति और शांति


ईश्वर की सृष्टि में बालक उसका एक अद्भुत और निर्दोष सृजन है।

हम बालक के विकास की गति को पहचानें।

जिसने आज के बालक को स्वतंत्र और स्वाधीन बनने की अनुकूलता कर दी है,

उसने मनुष्य जाति को सर्वांगीण
क्रांति  और सम्पूर्ण शांति के मार्ग पर चलता कर दिया है।

4 – जवाब दीजिए


मैं खेलूँ कहाँ?

मैं कूदूँ कहाँ?

मैं गाऊँ कहाँ?

मैं किसके साथ बात करूँ?

बोलता हूँ तो माँ को बुरा लगता है।

खेलता हूँ तो पिता खीजते हैं।

कूदता हूँ, तो बैठ जाने को कहते हैं।

गाता हूँ, तो चुप रहने को कहते हैं।

अब आप ही कहिए कि मैं कहाँ जाऊँ? क्या करूँ?

5–खुद काम करने दीजिए


बालक को खुद काम करने का शौक होता है।

उसे रूमाल धोने दीजिए।

उसे प्याला भरने दीजिए।

उसे फूल सजाने दीजिए।

उसे कटोरी माँजने दीजिए।

उसे मटर की फली के दाने निकालने दीजिए।

उसे परोसने दीजिए।

बालक को सब काम खुद ही करने दीजिए।

उसकी अपनी मर्जी से करने दीजिए।

उसकी अपनी रीति से करने दीजिए।

6–परख


हमारी आँख में अमृत है या विष,

हमारी बोली में मिठास है या कडुआहट,

हमारे स्पर्श में कोमलता है या कर्कशता,

हमारे दिल में शांति,है या अशांति,

हमारे मन में आदर है या अनादर,

बालक इन बातों को तुरंत ही ताड़ लेता है।

बालक हमें एकदम पहचान लेता है।

7 – दुश्मन


'सो जा, नहीं तो बाबा पकड़ कर ले जाएगा।'

'खा ले, नहीं तो चोर उठा कर ले भागेगा।'

'बाघ आया !'

'बाबा आया !'

'सिपाही आया !'

'चुप रह, नहीं तो कमरे में बंद कर दूँगी।'

'पढ़ने बैठ नहीं तो पिटाई करूँगी।'

जो इस तरह अपने बालकों को डराते हैं, वे बालकों के दुश्मन हैं।

8–हम क्या सोचेंगे?


बालक का हास्य जीवन की प्रफुल्लता है।

बालक का रुदन जीवन की अकुलाहट है।

बालक के हास्य से फूल खिलता है।

बालक के रुदन से फूल मुरझाता है।

हमारे घरों में बाल–हास्य की मंगल शहनाइयों के बदले

बाल–रुदन के रण–वाद्य क्यों बजते हैं?

क्या हम सोचेंगे?

9–पृथ्वी पर स्वर्ग


यदि हम बालकों को अपने घरों में उचित स्थान दें,

तो हमारी इस पृथ्वी पर ही स्वर्ग की सृष्टि हो सके।

स्वर्ग बालक के सुख में है।

स्वर्ग बालक के स्वास्थ्य में है।

स्वर्ग बालक की प्रसन्नता में है।

स्वर्ग बालक की निर्दोष मस्ती में है।

स्वर्ग बालक के गाने में और गुनगुनाने में है।

10–महान आत्मा


बालक की देह छोटी है, लेकिन उसकी आत्मा महान है।

बालक की देह विकासमान है।

बालक की शक्तियाँ विकासशील हैं।

लेकिन उसकी आत्मा तो सम्पूर्ण है।

हम उस आत्मा का सम्मान करें।

अपनी गलत रीति–नीति से हम बालक की शुद्ध आत्मा को भ्रष्ट और कलुषित न करें।

11–हम समझें


बालक सम्पूर्ण मनुष्य है।

बालक में बु​द्धि है, भावना है, मन है, समझ है।

बालक में भाव और अभाव है, रुचि और अरुचि है।

हम बालक की इच्छाओं को पहचानें।

हम बालक की भावनाओं को समझें।

बालक नन्हा और निर्दोष है।

अपने अहंकार के कारण हम बालक का तिरस्कार न करें।

अपने अभिमान के कारण हम बालक का अपमान न करें।

12–चाह


बालक को खुद खाना है, आप उसे खिलाइए मत।

बालक को खुद नहाना है, आप उसे नहलाइए मत।

बालक को खुद चलना है, आप उसका हाथ पकड़िए मत।

बालक को खुद गाना है, आप उससे गवाइए मत।

बालक को खुद खेलना है, आप उसके बीच में आइए मत।
क्योंकि बालक स्वावलम्बन चाहता है।

13–क्या इतना भी नहीं करेंगे?


क्लब में जाना छोड़कर बालक को बगीचे में ले जाइए।

गपशप करने के बदले बालक को चिड़ियाघर दिखाने ले जाइए।

अखबार पढ़ना छोड़कर बालक की बातें सुनिए।

रात सुलाते समय बालक को बढ़िया कहानियाँ सुनाइए।

बालक के हर काम में गहरी दिलचस्पी दिखाइए।

14–नौकर की दया


सचमुच वह घर बड़भागी घर है।

जहाँ पति–पत्नी प्रेमपूर्वक रहते हैं।

जिसके आँगन में गुलाब के फूल के से बालक खेलते–कूदते हैं।

जहाँ माता–पिता बालकों को अपने प्राणों की तरह सहेजते हैं।

जहाँ बालक बड़ों से आदर पाते हैं।

और जहाँ बालकों को घर के नौकरों की दया पर जीना नहीं पड़ता है।

सचमुच वह घर एक बड़भागी घर है।

15–आत्म सुधार


बालक का सम्मान इसलिए कीजिए, कि हममें आत्म–सम्मान की भावना जागे।

बालक को डाँटिए–डपटिए मत,

जिससे डाँटने–डपटने की हमारी गलत आदत छूटने लगे।

बालक को मारिए–पीटिए मत,

जिससे मारने–पीटने की हमारी पशु–वृत्ति नष्ट हो सके।

इस तरह अपने को सुधरकर ही

हम अपने बालकों का सही विकास कर सकेंगे।

16 –भय और लालच


माँ–बाप और शिक्षक समझ लें कि

मारने से या ललचाने से बालक सुधर नहीं सकते,

उलटे वे बिगड़ते हैं।

मारने से बालक में गुंडापन आ जाता है।

ललचाने से बालक लालची बन जाता है।

भय और लालच से बालक बेशरम, ढीठ और दीन–हीन बन जाता है।

17 – सच्ची शाला : घर


अगर माँ–बाप यह मानते हैं कि

स्वयं चाहे जैसा आचरण करके भी

वे अपने बालकों को संस्कारी बना सकेगें,

तो वे बड़ी भूल करते हैं।

माँ–बाप और घर, दोनों दुनिया की

सबसे बड़ी और शक्तिशाली शालाएँ हैं।

घर में बिगाड़े गए बालक को भगवान भी सुधार नहीं सकता!

18 – प्रकृति का उपहार


प्रकृति से दूर रहने वाला बालक, प्रकृति के भेद को कैसे जानेगा?

जगमगाती चाँदनी, कलकल बहती नदी,

खेत की मिट्टी,

बाड़ी के घर, टेकरी के कंकर, खुली हवा और आसमान के रंग,

ये सब वे उपहार हैं, जो बालक को प्रकृति से प्राप्त हुए हैं।

बालक को जी भरकर प्रकृति का आनन्द लूटने दीजिए।

19 – गतिमान


बालक पल–पल में बढ़नेवाला प्राणी है।

बालक की दृष्टि प्रश्नात्मक है।

बालक का हृदय उद्गारात्मक है।

बालक के व्याकरण में प्रश्न और उद्गार हैं।

लेकिन पूर्णविराम कहीं नहीं हैं।

बालक का मतलब है, मूर्तिमन्त गति –

अल्प विराम भी नहीं।

20 – नया युग


नागों की पूजा का युग बीत चुका है।

प्रेतों की पूजा का युग बीत चुका है।

पत्थरों की पूजा का युग बीत चुका है।

मानवों की पूजा का युग भी बीत चुका है।

अब तो, बालकों की पूजा का युग आया है।

बालकों की सेवा ही उनकी पूजा है।

21 – झगड़े


माता–पिता के और बड़ों के झगड़ों के कारण

घर का वातावरण अकसर अशान्त रहने लगता है।

इससे बालक बहुत परेशान हो उठते हैं।

और किसी कारण नहीं, तो अपने बालकों के कारण ही

हम घर में हेलमेल से भरा जीवन जीना सीख लें।

घर के शान्त और सुखी वातावरण में

बालक का महान शिक्षण निहित है।

22 – गिजुभाई की बात


बालकों ने प्रेम देकर मुझे निहाल किया।

बालकों ने मुझे नया जीवन दिया।

बालकों को सिखाते हुए मैं ही बहुत सीखा।

बालकों को पढ़ाते हुए मैं ही बहुत पढ़ा।

बालकों का गुरु बनकर मैं उनके गुरु–पद को समझ सका।

यह कोई कविता नहीं है।

यह तो मेरे अनुभव की बात है।

23 – दिव्य संदेश


बालदेव की एकोपासना कीजिए ।

अकेले इस एक ही काम में बराबर लगे रहिए।

सफलता की यही चाबी है।

बालकों द्वारा प्रभु के संदेश को ग्रहण करने की बात मनुष्य को सूझती क्यों नहीं है?

बालक का संदेश किसी एक जाति या देश के लिए नहीं है।

बालक का संदेश तो समूची मनुष्य–जाति के लिए एक दिव्य संदेश है।

24–जीवित ग्रंथ


जो पुस्तकें पढ़कर ज्ञान प्राप्त करेंगे, वे शिक्षक बनेंगे।

जो बालकों को पढ़कर ज्ञान प्राप्त करेंगे, वे शिक्षा–शास्त्री बनेंगे।

शिक्षा शास्त्री के लिए हरएक बालक

एक समर्थ, अद्वितीय और जीवित ग्रंथ है।

25–बालक की शक्ति


आप सारी दुनिया को धोखा दे सकते हैं,

लेकिन अपने बालकों को धोखा नहीं दे सकते हैं।

आप सबको सब कहीं बेवकूफ बना सकते हैं,

लेकिन अपने बालकों को कभी बेवकूफ नहीं बना सकते।

आप सबसे सब कुछ छिपा सकते हैं,

लेकिन अपने बालकों से कुछ भी नहीं छिपा सकते।

बालक सर्वज्ञ हैं, सर्वव्यापक हैं, सर्वशक्तिमान हैं।

26–बातें बेकार हैं


क्या हमारे पढ़ने, सोचने और लिखने–भर से

हमारा काम पूरा हो जाता है।

नहीं, हमें तो शिक्षा के नये–नये मन्दिरों का निर्माण करना है,

और उन मन्दिरों में अब तक अपूज्य रही सरस्वती देवी की स्थापना करनी है।

बालकों के लिए नये युग का आरम्भ हुआ है।

केवल बातें करने से अब कुछ बनेगा नहीं।

कुछ कीजिए! कुछ करवाइये!!

27–एड़ी का पसीना चोटी तक


बालक के साथ काम करना जितना आसान है, उतना ही मुश्किल भी है।

बाल–स्वभाव का ज्ञान, बालक के लिए गहरी भावना और सम्मान,

बालक के व्यक्तित्व के प्रति श्रद्धा और उसके प्रति आन्तरिक प्रेम,

इस सबको प्राप्त करने में एड़ी का पसीना चोटी तक पहुँचाना पड़ता है।

28–याद रखिए


गली की निर्दोष धूल बालक को चन्दन से भी अधिक प्यारी लगती है।

हवा की मीठी लहरें बालक के लिए माँ के चुम्बन से भी अधिक मीठी होती हैं।

सूरज की कोमल किरणें बालक को हमारे हाथ से भी अधिक मुलायम लगती हैं।

29–चैन कैसे पड़े?


जब तक बालक घरों में मार खाते हैं,

और विद्यालयों में गालियाँ खाते हैं,

तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?

जब तक बालकों के लिए पाठशालाएँ, वाचनालय, बाग–बगीचे और क्रीड़ांगन न बनें,

तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?

जब तक बालकों को प्रेम और सम्मान नहीं मिलता, तब तक मुझे चैन कैसे पड़े?

30 – शिक्षक के लिए सब समान


बालक कई प्रकार के होते हैं।

अपंग और अंधे, लूले और लंगड़े, मूर्ख और मंद–बु​द्धि,

काले और कुरूप, कोढ़ी और खाज–खुजली वाले,

इसी तरह खूबसूरत, ताजे–तगड़े, चपल, चंचल, होशियार और चलते–पुरजे।

सच्चे शिक्षक की नजर में ये सब समान रूप से भगवान के ही बालक हैं।

31–बाल–क्रीड़ांगण


क्या भारत के लाखों–करोड़ों बालकों को हम हमेशा गन्दी गलियों में ही भटकने देंगे?

या तो हम बालकों को घरों में काम करने के मौके दें,

या गली–गली में और चौराहों–चौराहों पर बाल क्रीड़ांगन खड़े करें।

ये बाल क्रीड़ांगन ही बाल विकास के सबसे आसान, अच्छे और सस्ते साधन हैं।

32–करेंगे या मरेंगे


मैं पल–पल में नन्हें बच्चों में विराजमान

महान आत्मा के दर्शन करता हूँ।

यह दर्शन ही मुझे इस बात के लिए प्रेरित कर रहा है

कि मैं बालकों के अधिकारों की स्थापना करने के लिए जिन्दा हूँ,

और इस काम को करते–करते ही मर–मिट जाऊँगा।

33–धर्म का शिक्षण


धर्म की बातें कह कर,

धर्म के काम करवा कर,

धर्म की रूढ़ियों की पोशाकें पहना कर,

हम बालकों को कभी धर्माचरण करने वाला बना नहीं सकेंगे।

धर्म न किसी पुस्तक में है, और न किसी उपदेश में है।

धर्म कर्म–काण्ड की जड़ता में भी नहीं है।

धर्म तो मनुष्य के जीवन में है।

अगर शिक्षक और माता–पिता अपने जीवन को धर्मिक बनाए रखेंगे,

तो बालक को धर्म का शिक्षण मिलता रहेगा।

34–अपनी ओर देख


जब तू प्रभु नहीं है तो अपने बालकों का प्रभु क्यों बनता है।

जब तू सर्वज्ञ नहीं है, तो बालकों की अल्पज्ञता पर क्यों हँसता है?

जब तू सर्वशक्तिमान नहीं है, तो बालकों की अल्प शक्ति पर क्यों चिढ़ता है?

जब तू संपूर्ण नहीं है, तो बालकों की अपूर्णता पर क्यों क्षुब्ध होता है?

पहले तू अपनी ओर देख, फिर अपने बालकों की ओर देख!

प्रेम और शांति --- गिजुभाई

प्रेम और शांति


अगर हमें दुनिया में सच्ची शांति प्राप्त करनी है और अगर हमें युद्ध के विरुद्ध लड़ाई लड़नी है तो हमें बालकों से इसका आरंभ करना होगा, और अगर बालक अपनी स्वभाविक निर्दोषता के साथ बड़े होंगे, तो हमें संघर्ष नहीं करना पड़ेगा,, हमें निष्फल और निरर्थक प्रस्ताव पास नहीं करने पड़ेगे। बल्कि हम प्रेम से अध्कि प्रेम की ओर

और शांति से अधिक शांति की ओर बढ़ेंगे।  यहाँ तक कि अंत में दुनिया के चारों कोने उस प्रेम और शांति से

भर जाएँगे, जिसके लिए आज सारी दुनिया जाने या अनजाने तरस और तड़प रही है।

'यंग इंडिया' 19-11-1931


Thursday, November 15, 2012

बालकों के गाँधी

                                     बालकों के गाँधी    
 गांधी जी का दर्शन सत्य, अहिंसा, प्रेम, करुणा, मानव-मानव के बीच पारस्पारिक सम्मान, दीनदलितों के उद्धार, मानवीय एकता एवं विश्वबन्धुत्व पर आधारित था। महात्मा गाँधी ने जिस अहिंसक क्रान्ति के द्वारा देश की स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष किया। जो काम देश के स्तर पर गाँधी जी ने किया, बाल शिक्षा के क्षेत्र में वही काम 1920 से 1939 तक गिजुभाई ने कर दिखाया। बालकों की स्वतन्त्रता के लिए, स्वावलम्बन के लिए, उनके सम्मान और स्वाभिमान की रक्षा के लिए वे अपनी पूरी शक्ति और भक्ति के साथ निरन्तर जूझते रहे।
     श्री किशोरीलाल मशरुवाला ने ‘स्मरणांजलि’ में लिखा है- ‘‘ इनकी विशिष्ट शाला मांटेसरी की वजह से महत्वपूर्ण नहीं थी, वरन् बालकों के प्रति व्यवहार की जो नयी दृष्टि इन्होने ग्रहण की थी, उसकी वजह से महत्वपूर्ण थी। यह दृष्टि उन्होने बालसमुदाय के प्रति विकसित की तथा गुजरात के माता-पिता व शिक्षकों को नूतन संस्कार प्रदान किए। गाँधी  जी ने अपने आश्रम में अहिंसा की जिस दृष्टि पर बल दिया था, उसे गिजुभाई ने माता-पिता एवं शिक्षकों का स्वाभाविक वात्सल्य जगाकर, शिक्षाशास्त्र से उसे प्रमाणिक बनाया। बालमन्दिर की कला से अंकृत करके लोकप्रिय बनाया। अहिंसक संस्कृति का आधार निर्मित करने मे गिजुभाई ने इस तरह बहुत बड़ा योगदान दिया है। इसलिए गिजुभाई के मित्र तथा सुविख्यात गाँधीवादी शिक्षाविद् श्री जुगतराम दवे ने  उन्हे ‘बालको के गाँधी’ नाम से विभूषित  किया।
     गिजुभाई की शैक्षिक विचारधारा के मूल में गाँधी जी का जीवन दर्शन विद्यमान है। स्वातन्त्रय, स्वावलम्बन, प्रेम करुणा, मानव-सम्मान, राष्ट्रीयता, दलितोद्वार (बालक का उद्धार) दीन वत्सलता, मानव-सेवा ये सब गाँधी जी के दर्शन के ही आधार तत्व हैं।
गाँधी जी के विचारों को गिजुभाई ने व्यवहार में उतारा था। इसका प्रमाण अनेक घटनाओं से मिल जाता है बालमन्दिर में शिक्षक वर्ग को सम्बोधित करते हुए कहा था- ‘‘दबाबों से राज्य नही दबे रहते, तो बालमन्दिर के बालक भला कैसे दबेंगे। बालमन्दिर से दण्ड को मिटाकर ही दुनिया से हिंसा नहीं रहेगी, तो भला शाला में क्यों रहें ? क्यों रहनी चाहिए ? हमारे मन में बच्चे पर किसी प्रकार से अंकुश लगाने की जब इच्छा जागे तो मात्र यही सोचना पर्याप्त होगा कि वह कितना निर्बल है और हम कितने बलवान हैं। निर्बल को सजा देना हिंसा से भी बदतर कार्य है। बालक को दण्ड देकर हम आगामी पीढ़ी की जड़ों में हिंसा का जल ही सीचेंगे।’’





दूरस्थ शिक्षा में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका

दूरस्थ शिक्षा में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका
                               
                                                             
                                                                
       
        शिक्षा जीवन पर्यन्त चलने वाली प्रक्रिया है। यह विकास का मूलाधार है। किसी भी राष्ट्र का विकास शिक्षा के अभाव में असम्भव है चाहे वह राष्ट्र कितने ही प्राकृतिक संसाधनों से आच्छादित क्यों न हो। आज के बदलते परिवेश में परिवर्तन की धारा ने शिक्षा को विशेष रूप से प्रभावित किया है। जहाँ एक ओर मानवीय सम्बन्धों में बदलाव आया है, वहीं विज्ञान के बढ़ते चरण ने शिक्षा की दशा व दिशा दोनों ही परिवर्तित किये है। वैज्ञानिक आविष्कारों से प्रत्येक क्षेत्र में युगान्तकारी परिवर्तन हुए है। मनुष्य ने तकनीकी उन्नति के माध्यम से स्वयं का जीवन उन्नत किया है। सम्पूर्ण विश्व में वैश्वीकरण व मुक्त अर्थव्यवस्था का बोलबाला है। अब प्रश्न यह उठता है कि परिर्वतन की इस आँधी में क्या प्रत्येक व्यक्ति का मानसिक, सामाजिक व आर्थिक विकास हुआ है? यदि नही तो इसमें सुधार की क्या सम्भावना तलाशी जाय? शिक्षा ही वह हथियार है जिसके द्वारा व्यक्ति के जीवन स्तर को ऊँचा उठाया जा सकता है। शिक्षा की व्यवस्था इस प्रकार होनी चाहिए कि निम्नतम से निम्नतम व्यक्ति भी इसकेे द्वारा लाभान्वित हो सके और वैश्वीकरण के इस दौर में अपनी भूमिका निश्चित कर सके।
        छात्र व छात्राओं की वर्तमान पीढ़ी में कुछ अभूतपूर्व परिवर्तन देखे जा सकते है। वे विद्यालयी शिक्षा को तो सहर्ष स्वीकार करते है, परन्तु इसके बन्धनों से परे शिक्षा की अपेक्षा भी करने लगे है। इस दौर में दूरस्थ शिक्षा द्वारा विकास की सम्भावनाएँ तलाशी जा रही है। दूरस्थ शिक्षा को सफल बनाने में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका का निहितार्थ भी तलाशा जाने लगा है। और इसे भरपूर उपयोग करके दूरस्थ शिक्षा की गुणवत्ता व उपयोगिता को बनाये रखने के प्रयास जारी है। इस हेतु आज शिक्षा को सैद्धान्तिक पाठ्यक्रमों के भँवर जाल से निकालकर मजबूत व्यावहारिक आधार देने की नितान्त आवश्यकता है।
        शिक्षा बालक के सर्वांगीण विकास की ओर इंगित करती है, जिसके लिए पूर्व में चल रही शिक्षा व्यवस्था में कुछ आमूल-चूल परिवर्तन करने होगें, क्योंकि वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के युग में बालक पुरानी शिक्षा व्यवस्था से वैश्वीकरण के सम्प्रत्यय को प्राप्त नही कर सकेगा। एक नये युग में प्रवेश जैसी धारणा को ध्यान में रखकर उसके पाठ्यक्रम, शिक्षण विधियों, मूल्यांकन व्यवस्था तथा उसको प्रदान किये जाने वाले अनुभवों को एक नया स्वरूप प्रदान करना होगा, जिससे आने वाली समस्याओं का समाधान वह स्वयं कर सके।
          उच्चतर शिक्षा में विस्तार, उत्कृष्टता और समावेशन के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए मुक्त और दूरस्थ शिक्षा तथा मुक्त शैक्षिक संसाधनों का विकास अनिवार्य है। उच्चतर शिक्षा में दाखिल छात्रोें में 1/5 से अधिक छात्र मुक्त और दूरस्थ शिक्षा धारा में है। राष्ट्रीय ज्ञान आयोग यह सिफारिश करता है कि दूरस्थ शिक्षा को इन विषयों पर ध्यान केन्द्रित करना होगा। एक राष्ट्रीय आई0सी0टी0 आधारिक-तन्त्र का सृजन करनाय विनियामक तंत्रों में सुधार लाना, वेव आधारित साझा मुक्त संसाधन विकसित करना, क्रेडिट बैंक स्थापित करना और राष्ट्रीय परीक्षण सेवा उपलब्ध कराना। इसकी संपूर्ति के लिए एनकेसी यह भी सिफारिश करता है कि उत्तम अंतर्वस्तु का निर्माण तथा वैश्विक मुक्त शैक्षिक संसाधनों का लाभ उठाने की ओर एक व्यापक ढंग से ध्यान केन्द्रित किये जाने की जरूरत है। हमें सभी सामग्री अनुसंधान लेखों, पुस्तकों, पत्रिकाओं आदि की मुक्त सुलभता को भी प्रोत्साहित करना चाहिए।
        दूरस्थ शिक्षा की स्थिति पर दृष्टिपात करने से हम यह पाते है कि समूचे विश्व में अधिकांश विकासशील देशों ने मुक्त विश्वविद्यालयों की जरूरत महसूस की है। फ्रांस और यूके जैसे विकसित देशों ने मुक्त और दूरस्थ शिक्षा का मार्ग प्रशस्त किया है। आॅन लाइन शिक्षा के मांमले में संयुक्त राज्य अमेरिका निर्विवाद नेता बना हुआ है।
        वर्ष 2004-05 में भारत में उच्चतर शिक्षा में लगभग ग्यारह मिलियन लोग दाखिल थे, जिनमें से मुक्त और दूरस्थ शिक्षा प्रणाली (परम्परागत कालेजों के दूरस्थ शिक्षा संस्थानों (डी0ई0आई0) द्वारा प्रस्तुत पत्राचार पाठ्यक्रमों सहित) ने लगभग 20 प्रतिशत लोगों को उच्च शिक्षा उपलब्ध करायी। इसके भीतर मुक्त विश्वविद्यालयों ने उच्चतर शिक्षा की मांग में से 10 प्रतिशत की पूर्ति की। 1996 से 2004 तक उच्चतर शिक्षा तथा मुक्त व दूरस्थ शिक्षा के नामांकन में वृद्धि हुई। 2000-01 में उच्चतर शिक्षा की केवल 4 प्रतिशत मांग की पूर्ति मुक्त विश्वविद्यालयों द्वारा की गई, जबकि 2003-04 में इस आशय का अनुपात लगभग 10प्रतिशत था। दूरस्थ शिक्षा का समग्र योगदान लगभग 19 प्रतिशत है।
        21वीं सदी का शुभारम्भ सूचना प्रौद्योगिकी के युग के रूप में हुआ है। आज सूचना प्रौद्योगिकी पर राजनेताओं, योजनाकर्ताओं, प्रशासकों, व्यापारियों, वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं मीडिया से जुडे़ व्यक्ति, मनोरंजनकर्ताओं एवं सभी दूरदर्शी व्यक्तियों का रूझान है। क्योंकि इसका राष्ट्रीय विकास, विश्व व्यापार, वाणिज्य के संवर्द्धन उद्योग और कृषि के विकास तथा स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, राष्ट्रीय एकता व अन्य आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक कार्याे में अत्यधिक महत्व है।

        भारत एक विशाल देश है जहाँ जनसांख्यिकीय विस्फोट होने का अर्थ यह है कि उच्चतर शिक्षा को संगत आबादी की वृद्धि के साथ बने रहना होगा। भारत में उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में बहुत गहरा संकट है। उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करने वाली हमारी 18-24 वर्ष के आयु वर्ग की आबादी का अनुपात लगभग 7ः है, जो एशिया के औसत का सिर्फ आधा है। विश्वविद्यालयों में उपलब्ध स्थानों की संख्या के दृष्टि से उच्चतर शिक्षा के लिए मौजूदा अवसर हमारी आवश्यकता के हिसाब से बिल्कुल पर्याप्त नही है। इतना ही नही उच्चतर शिक्षा के स्तर में जबरदस्त सुधार की आवश्यकता है। भारत जैसे देशों में प्रति व्यक्ति आय कम है, अशिक्षा का स्तर भी अधिक हैय यहाँ भाषा, जीवन शैली व संस्कृति का बहुतायत है। इस स्तर पर सूचना प्रौद्योगिक एक उत्पे्ररक की भूमिका का निर्वहन कर सकती है। शिक्षा के क्षेत्र में इसका सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है। भारत सूचना प्रौद्योगिकी के शिक्षा व विकास के क्षेत्र में क्षमता विस्तार के बारे में पूरी तरह सजग है। मानव संसाधन विकास मंत्री ने अपने मंत्रालय के 100 दिनों का एजेण्डा प्रस्तुत करते हुए शिक्षा विस्तार, निवेश और गुणवत्ता को मूलमंत्र बताया। इनका विचार है कि पूरी दूनिया में उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण के कारण आए बदलाव को देखते हुए शिक्षा के लक्ष्य और उसकी जरूरतों में परिवर्तन आ गया है। केन्द्र सरकार का जोर इस बात पर है कि शिक्षा को सूचना, संचार तथा प्रौद्योगिकी से जोड़ा जाए और आॅन लाइन शिक्षा प्रदान की जाय। वर्चुअल विश्वविद्यालय बनाने की भी कल्पना है, जिसके तहत कोई भी छात्र घर बैठे कम्प्यूटर व इण्टरनेट के द्वारा पढ़ाई पूरी कर सके। वित्त मंत्री ने भी इस वजट में सूचना एवं प्रौद्योगिकी के जरिए शिक्षा प्राप्त करने के वास्ते अधिक धन का आवंटन किया है। भारतीय परिपे्रक्ष्य में शिक्षा को व्यापक स्तर पर लाने हेतु दूरस्थ शिक्षा अग्रणी भूमिका निभा सकता है, क्योंकि बिखरी हुई जनसंख्या का वृहत क्षेत्र शिक्षा से अहूता है। जन-जन तक शिक्षा की ज्योति पहुँचाने हेतु प्रौद्योगिकी की अग्रणी भूमिका है। दूरस्थ शिक्षा के क्षेत्र में सूचना सम्प्रेषण तकनीक के अनेक माध्यम है, जो प्रयोग में लाये जाते हैं। जैसे-
रेडियो प्रसारण, दूरदर्शन, श्रृव्य-दृश्य कैसटेस, इलेक्ट्रांनिक डाक, कम्प्यूटर नेटवर्क, फैक्स, टेलीकान्फ्रेन्सिग आदि।
        मुक्त विश्वविद्यालयों में सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका स्वतः स्पष्ट होती है क्योंकि रेडियो व टेलीवीजन द्वारा भी इसका क्रियान्वयन होता है। इण्टरनेट का प्रारम्भ सन् 1995 को हुआ। इसके माध्यम से छात्रों को शिक्षण प्रशिक्षण के कार्यक्रम आसानी से सुलभ हो जाते है। ज्ञानदर्शन व ज्ञानवाणी जैसे शैक्षिक चैनल भी इसमें सहायता करते हैै। ज्ञानवाणी 7 नवम्बर 2001 से शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण कर रहा है। इसी प्रकार ज्ञानदर्शन भी जनवरी 2000 से शैक्षिक कार्यक्रमों का प्रसारण करता है। अनेक शिक्षाविद् व विषय विशेषज्ञ इन कार्यक्रमों की गुणवत्ता को संवद्र्वित करते है तथा समस्याओं का समाधान भी इसी माध्यम से किया जाता है। भारतीय उपग्रह इन्सेट प् ठ की स्थापना भूमध्य रेखा के ऊपर 3600 ज्ञउ की ऊँचाई पर की गई। इसके माध्यम से दूरस्थ शिक्षा के प्रसार में रेडियो, टीवी का भरपूर उपयोग किया जाने लगा है।
        27 अक्टूबर 2009 को इग्नू ने तीसरी पीढी (3ळ) की मोबाइल फोन प्रौद्योगिकी के जरिए आॅन लाइन शिक्षा प्रदान करने के लिए स्वीडन की दूर संचार कम्पनी एरिक्सन के साथ एक समझौते पर हस्ताक्षर किये है। अधिकारियों ने बताया कि इग्नू शुरूआत में सूचना प्रौद्योगिकी का सर्टीफिकेट कोर्स कर रहे 1000 छात्रों को 3ळ के जरिए शिक्षा देगा। अगले छः माह के लिए इसे पायलेट परियोजना की तरह चलाया जायेगा। इग्नू ने छः माह बाद पूरे देश में चलाये जा रहे सभी कोर्सो में 3ळ का उपयोग करने की योजना बनाई है।
        भारत में प्ब्ज् के उपयोग के क्षेत्र में विशाल भौगोलिक व जनसांख्यिकीय  आधार पर असमानता पाई जाती है। भारत में विश्व का सबसे अधिक प्ब्ज् कार्य बल है। इससे एक ओर जहाँ देश में प्रौद्योगिकी उपयोग से बंगलौर और गुड़गाँव जैसे शहरों का विकास व उच्च आय वर्ग की उत्पत्ति हुई है। वहीं दूसरी ओर देश का एक बड़ा हिस्सा टेलीफोन कनेक्टीविटी से भी वंचित है। प्रधानमंत्री जी द्वारा जुलाई 1998 में गठित कार्य दल ने स्कूलों तथा शिक्षा क्षेत्र में प्ज् का उपयोग करने की सिफारिश की थी। दूरस्थ शिक्षा एवं रोजगार प्रदान करने के लिए श्रृव्य-दृष्य एवं उपग्रह आधारित उपकरणों के माध्यम से सूचना व संचार प्रौद्योगिकी के प्रयोग को बढ़ावा देना भी इसमें सम्मिलित है। स्पष्ट है कि जनसंख्या के बढ़ते दबाव में दूरस्थ शिक्षा एक ऐसा विकल्प हो सकता है, जोकि हमारे देश की शिक्षा सम्बन्धी आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके। आंकडे़ भी बताते है कि दूरस्थ शिक्षा की भागीदारी निश्चित रूप से सराहनीय है परन्तु शिक्षा के स्तर व आपूर्ति तंत्र में सुधार की महती आवश्यकता है। क्योंकि गुणवत्ता सम्बन्धी चिन्ताएं आय के सापेक्ष गौण हो जाती है। दूर शिक्षा में गुणवत्ता संवर्द्धन हेतु सूचना प्रौद्योगिकी की भूमिका तय करने में भारी निवेश की आवश्यकता है क्योंकि महत्वपूर्ण आयोगों, शिक्षाविद्ों तथा सरकार ने भी प्रौद्योगिकी के प्रयोग पर बल दिया है।
        उच्चतर शिक्षा में मुक्त और दूरस्थ शिक्षा का मौजूदा आकार और हिस्सा महत्वपूर्ण है फिर भी जीवनपर्यन्त अधिगम की दृष्टि से यह अत्यन्त छोटा है। विभिन्न इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों का शिक्षा शास्त्रीय प्रयोग अभी भी बहुत सीमित है। इसे विस्तृत करने की जरूरत है। यदि सूचना प्रौद्योगिकी के सशक्त माध्यम से जैसे-इण्टरनेट , इलेक्ट्राॅनिक मेल,
फैक्स व टेलीकोफ्रेसिंग का भरपूर प्रयोग किया जाय तो औपचारिक शिक्षा की अपेक्षा दूरस्थ शिक्षा पर व्यय भार भी कम होगा तथा शिक्षा की गम्भीर चुनौतियों का सामना करने में दूरस्थ शिक्षा निश्चित रूप से सक्षम होगी।
दूरस्थ शिक्षा को सफल व सार्वभौमिक बनाने हेतु निम्नांकित सुझाव प्रस्तुत हैं-
1.    शिक्षण प्रक्रिया में सूचना प्रौद्योगिकी का भरपूर प्रयोग किया जाय।
2.    तहनीकी माध्यमों से ही परीक्षा प्रक्रिया पर बल दिया जाय।
3.    जनसंख्या के बढ़ते दबाव को देखते हुए दूरस्थ शिक्षा में भारी निवेश की भी आवश्यकता है।
4.    टेलीकांन्फ्रेसिंग का प्रयोग करके शिक्षक-छात्र सम्पर्क पर बल दिया जाय, क्योंकि दूरस्थ शिक्षा का यह बिन्दु सर्वाधिक विचारणीय है।
5.    दूरस्थ शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने में श्रृव्य-दृश्य सामग्री को प्रत्येक अधिगमकर्ता के लिए उपलब्ध कराया जाय।
6.    उपग्रह सम्प्रेषण द्वारा भी शिक्षण प्रक्रिया को सुलभ बनाया जाय।
7.    छात्र-छात्राओं की समस्याओं का इलेक्ट्राॅनिक माध्यमों द्वारा दु्रतगामी समाधान भी किया जाय, जिससे दूरस्थ शिक्षा औपचारिक शिक्षा के सामने गुणवत्ता की कसौटी पर खरी उतरें।
8.    दूरस्थ शिक्षा को ’’सूचना प्रौद्योगिकी क्रान्ति’’ द्वारा ’’ज्ञान का विस्फोट’’ जैसी संकल्पना को साकार किया जाय।


गिजुभाई .. बालकों का युग


            गिजुभाई ..  बालकों का युग
                    गिजुभाई बालकों के हृदय की गहराइयों को माप सकने वाले भारतीय शिक्षाविद् थे। तत्कालीन समय में परम्परा और रुढि़ग्रस्त भारतीय समाज में बालक की महिमा को प्रतिष्ठिता करने वाले वे पहले व्यक्ति थे। उनका मानना था कि बालक को प्रेम करने की क्षमता अर्जित करने पर ही हम सुखी और समृद्ध समाज की कल्पना कर सकते हैं। नये समाज की कल्पना का यह सूत्र हमें आज भी उद्धेलित करता है-
‘‘नागों की पूजा का युग बीत चुका है।
प्रेतों की पूजा का युग बीत चुका है।
पत्थरो की पूजा का युग बीत चुका है।
              मानवों की पूजा का युग बीत चुका है। 
अब तो बालकों की पूजा का युग बीत चुका है।
बालकों की सेवा ही उनकी पूजा है।
नये युग का निर्माण कौन करेगा ?
जनजीवन के प्रवाह को कौन अस्खलित बनाये रखेगा ?
आने वाले युग का स्वामी कौन होगा ?
                             बेशक बालक ही।

गिजुभाई का बालदर्शन


गिजुभाई का बालदर्शन

गिजुभाई का बालदर्शन

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