Saturday, December 15, 2012

कविता सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

कविता

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना




लीक पर वे चलें

लीक पर वे चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

साक्षी हों राह रोके खड़े
पीले बाँस के झुरमुट,
कि उनमें गा रही है जो हवा
उसी से लिपटे हुए सपने हमारे हैं ।

शेष जो भी हैं-
वक्ष खोले डोलती अमराइयाँ;
गर्व से आकाश थामे खड़े
ताड़ के ये पेड़,
हिलती क्षितिज की झालरें;
झूमती हर डाल पर बैठी
फलों से मारती
खिलखिलाती शोख़ अल्हड़ हवा;
गायक-मण्डली-से थिरकते आते गगन में मेघ,
वाद्य-यन्त्रों-से पड़े टीले,
नदी बनने की प्रतीक्षा में, कहीं नीचे
शुष्क नाले में नाचता एक अँजुरी जल;
सभी, बन रहा है कहीं जो विश्वास
जो संकल्प हममें
बस उसी के ही सहारें हैं ।

लीक पर वें चलें जिनके
चरण दुर्बल और हारे हैं,
हमें तो जो हमारी यात्रा से बने
ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

Thursday, December 13, 2012

शिक्षा का महत्व


   शिक्षा का महत्व

शिक्षा शब्द का अर्थ है ज्ञानार्जन करना, किसी कार्य के योग्य होने या निष्णात होने की इच्छा। पशुओं और मनुष्यों में यह अंतर है कि मनुष्यों में परमेश्वर ने पशुओं की अपेक्षा स्वाभाविक ज्ञान अधिक दिया है। बहुत से पशु चाहे रेगिस्तान में जन्मे हों व पानी का तालाब तक न देखा हो, परंतु नदी में छोड़ते ही तैरने लगते हैं, जबकि नाविक के बेटे को तैरना सीखना पड़ता है। शिक्षा जीवन का वह महत्वपूर्ण अंग है जो हमें बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक अनुशासित, संयत और प्रगतिशील बनाए रखती है। शिक्षा से मनन शक्ति, चेतना, सद्बुद्धि, विचारशीलता तथा ज्ञान की प्राप्ति होती है। प्राचीन शिक्षा पद्धति में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को जीवन का लक्ष्य माना गया है।

अथर्ववेद के एक मंत्र में कहा गया है- श्शं सरस्वती सह धीभिरस्तुश् जिसका भावार्थ यह है कि शिक्षा के द्वारा जीवन में विवेक का गुण जागृत होना चाहिए, जिससे वह बुद्धि के द्वारा दुर्गुणों को छोड़े और सद्गुणों को अपनाए। यह सुसंस्कृत बुद्धि मनुष्य को आजीवन सुरक्षा प्रदान करती है। कहा गया है-श्विद्या ददाति विनयम्श् विद्या से सुशीलता प्राप्त होती है। इसके द्वारा ही श्रद्धा और मेधा प्राप्त होती है। प्राचीन समय से शिक्षा का लक्ष्य शुद्ध संस्कार और पवित्र धर्म की भावना जागृत करना रहा है। शिक्षा वह बहुमूल्य निधि है जो हमें स्थूल और सूक्ष्म विषयों का ज्ञान कराती है। शिक्षा हमें इस योग्य बनाती है कि हम धन अर्जित कर सकें, परंतु यह इसे प्राप्त करने का एकमात्र उद्देश्य नहीं होना चाहिए। यह मनुष्य में लौकिक व्यवहारों का ज्ञान कराकर समाज में उचित रूप से व्यवहार करना सिखाती है। शिक्षा के द्वारा ही हमें वेद, उपनिषद, दर्शन की ओर अग्रसर करती है। हम ब्रह्म, आत्मा, लोक-परलोक आदि गूढ़ विषयों का चिंतन करते हैं। हमें ज्ञात होता है कि मनुष्य जीवन बहुमूल्य है। इसका उद्देश्य केवल भौतिक सुख प्राप्त कराना नहीं है, बल्कि आत्मज्ञान, ब्रह्मज्ञान और मोक्ष प्राप्त करना है। इसीलिए कहा गया है कि सा विद्या या विमुक्तये अर्थात् विद्या वह है जो हमें अमरता प्राप्त कराती है। 

Saturday, December 8, 2012

GIJUBHAI : Burden Of HOME ASSIGNMENT


 GIJUBHAI : 
     Burden               
         Of
     HOME ASSIGNMENT




are stealing valuable moments from child’s life that he spent in enjoying certain things of his interest. He has felt home assignments are creating a kind of havoc in the mind of child when after spending so many hours studying at school, he has to indulge in the same activities again at home. He portrayed child’s helplessness in following thoughts.
     “It is beautiful morning; the sun has just come out and touched the earth with its golden rays. This is the moment; when one wishes to go outside and wander in the cool air of early morning but children have to finish their homework. They are not allowed to enjoy these precious moments. ”

He gave another example ─
     “Child’s eyes are heavy with sleep as its now time to sleep. But he has to finish the incomplete homework. After dinner, child wishes to relax by the side of his parents, he wants to talk about many things that happened to him during the day but he is unable to do so due to the burden of homework. It could be the time for bedtime stories, or a little play outside in a moon light night. But all these opportunities would evade the child as he has to complete his homework. ”

   Gijubhai contented that teacher gets tired after the whole day’s teaching but a child is not considered to have any right for relaxation after a whole day’s learning activity at school. Why it is so, that the ghost of homework chases him back up to his home and does not allow him to sleep comfortably in night, neither give him the comfort of playing happily in the morning. Gijubhai suggested following measures to free child from his strained situation ─

·       First measure is to stop giving child any work to do at house. Child learns the subjects, refers to the textbooks, memorizes from the chapters in the school. It is enough for him to learn those things within those hours of school. After that, there remain so many other things worthy enough to be learnt by the child.
·       Gijubhai pointed out that due to the defective methodology adopted during teachings, the need of giving homework arises. If child is made to understand the concepts clearly that taught at the school, there hardly remain any need to give any home assignments.
·       Teacher should be saved from the misconception that true learning happens by memorizing things. It is the reason behind giving child so many things to memorize at home.
·       There should be provision in the school itself that child could finish his incomplete work during the last period. This period must be kept for recapitulation done for the whole day work.





























Thursday, December 6, 2012

दिवास्वप्न




गिजुभाई

 का 

दिवास्वप्न-





                       ‘दिवास्वप्न’ बालशिक्षा के मुक्त और मौलिक स्वरूप 

का चित्रण करने वाली एक अनूठी कृति है। 12 मार्च 1931 के दिन इसका प्रथम गुजराती संस्करण प्रकाशित हुआ। दिसम्बर 1934 में इसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हुआ जिसके अनुवादकर्ता प्रख्यात शिक्षाविद् काशीनाथ त्रिवेदी जी थे। शिक्षाविद् श्री हरिभाई त्रिवेदी ने ‘दिवास्वप्न’ के संदर्भ में लिखा है- ‘‘दिवास्वप्न क्या है? कल की प्राथमिक शिक्षा की एक स्वल्प सी समालोचना है, और भविष्य की नवीन प्राथमिक पाठशाला के मनोहर और स्पष्ट रूप की एक सुन्दर झाँकी है।’’ प्रख्यात शिक्षाविद् रमेश दवे ने ‘दिवास्वप्न’ के विषय में कहा है- ‘‘दिवास्वप्न गिजुभाई की गीता है।’’ प्राथमिक शालाओं में बालकेन्द्रित और सामूहिक भागीदारी, अन्तः क्रिया और स्वशिक्षण की यह प्रथम नवाचार पुस्तक है। इसमें विविध शैक्षिक प्रयोग किए गए है। गिजुभाई ने माण्टेसरी पद्धति का जो भारतीय प्रादर्श बालमन्दिर में अपनाया था, उसका विस्तार मास्टर लक्ष्मीशंकर नामक एक काल्पनिक शिक्षक के माध्यम से प्राथमिक शाला में किया। प्राथमिक शाला भी आज की सरकारी, शालाओं जैसी अभावग्रस्त, आकर्षणहीन और शिक्षकों की उपेक्षा की शिकार या परम्परा की जड़ता से जकड़ी हुई उदासीन, निष्क्रिय, निष्प्राण और आनन्दविहीन। गिजुभाई ने यह देखकर अपना प्रथम हस्तक्षेप इसी शाला में किया।
महाशय लक्ष्मीशंकर जो कि ‘दिवास्वप्न’ की शैक्षिक क्रांतिकथा के नायक है, जब शिक्षा विभाग के अधिकारी महोदय से अनुमति प्राप्त करके अपने विचारों के मुताबिक नया शैक्षिक प्रयोग करने के लिए किसी विद्यालय की चैथी कक्षा को पढ़ाना शुरू करते है; तो वे वर्तमान शिक्षा के विभिन्न दोषों से सहज ही टकराते हैं और उन दोषों को दूर करने का अपने ढंग से प्रपत्न भी करते हैं जिसमें उनको काफी हद तक सफलता मिलती है। इस हेतु उनको अन्त में सराहना तथा प्रशंसा भी प्राप्त होती है।
गिजुभाई के ‘दिवास्वप्न’ के नायक लक्ष्मीशंकर शिक्षा में व्याप्त दोषांे का सफलतापूर्वक सामना करते हैं। गिजुभाई ने अध्यापक लक्ष्मीशंकर को एक कल्पनाशील, प्रयोगधर्मी, जीवंत और स्पंदन युक्त नायक  की तरह रचा और शिक्षा को अध्यापकीय आंतक से मुक्तकर उसे बालरंजन की आकर्षक और रूचिवान ऐसी प्रक्रिया बनाया, जिसमें स्कूल एक मनोरंजनालय बन गया और शिक्षा मनोरंजन हो गई।
‘दिवास्वप्न’ हमें बताता है कि हम भाषा, भूगोल, इतिहास, विज्ञान और गणित आदि सभी विषयों को किस प्राकर मनोरंजक बना सकते हैं। गिजुभाई के लक्ष्मीशंकर के पास व्याकरण जैसा विषय भी आकर खेलने लगता है और बालक की भाषा कभी नदी किनारे नाटक खेलती है, तो कभी बगीचों में काव्यपाठ करती है। जिस समय लक्ष्मीशंकर अपने प्रयोगों का जादूघर लेकर स्कूल पहूँचा था, तब शिक्षकों ने उनका उसी प्रकार मजाक उड़ाया था जिस प्रकार आज कई शिक्षक नये प्रयोगों को पागलपन की तरह देखते हैं। हेडमास्टर ने वैसे ही संदेह जाहिर किये थे जैसे कि आज के पाठ्यक्रम और परीक्षा से बंधे शाला-प्रमुख करते हैं, और अंग्रेज डाइरेक्टर को शायद वैसे ही शक रहे होंगे जैसे नवाचारों के प्रति प्रशासकों के होते हैं, मगर गिजुभाई के लक्ष्मीशंकर ने हर चुनौती को स्वीकार किया और शिक्षा, शिक्षक एवं बालक के प्रति सदियों से चली आ रही जड़ मान्यता को बदलकर रख दिया। ‘पलाश’ पत्रिका के सम्पादकीय में दिवास्वप्न के सन्दर्भ में कहा गया है- ‘‘पंचतन्त्र के विष्णुशर्मा ने जिस विधा को अपनाकर बिगडै़ल राजकुमार का चरित्र बदल दिया था, उसी तरह अध्यापक लक्ष्मीशंकर के रूप में दूसरा विष्णुशर्मा रचकर शिक्षा के जरिये आने वाली पीढ़ियों को बदलने का नया, आनन्दमय और गतिमय अभियान गिजुभाई ने दिया। गिजुभाई का ‘दिवास्वप्न’ आज के हर अध्यापक की बाइबिल हो, ट्रेनिंग संस्थाओं में तो वह एक पाठ्यपुस्तक की जगह ले और जब एक शिक्षक उसे आत्मसात करेगा, तो मुझे पूरा विश्वास है कि शैक्षिक जड़ता का कवच टूटेगा, शिक्षा में नवगति, नव-ताल-छंद-नव का मधुर संगीत सार्थक बन कर गूँजेगा।’’  गुजरात विद्यापीठ शिक्षण महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य श्री पुरूषोत्तम भाई पटेल ने ‘दिवास्वप्न’ के शैक्षिक महत्व की ओर इंगित करते हुए कहा है- ‘‘गिजुभाई ने कुछ और न किया होता, मात्र यह ‘दिवास्वप्न’ पुस्तक ही लिखी होती तब भी वे अमर हो जाते ।’’ ‘दिवास्वप्न’ अगर आज हर शिक्षक का स्वप्न हो जाए तो एक ऐसी नई पीढ़ी का निर्माण होगा जो कि स्वप्नदर्शी, कल्पनाशील, परिश्रमी, स्वावलम्बी तथा वास्तव में स्वाधीन होगी।


Wednesday, December 5, 2012

गिजुभाई द्वारा सृजित साहित्य


  गिजुभाई द्वारा सृजित साहित्य की सूची


      गिजुभाई द्वारा सृजित शिशु साहित्य, बाल साहित्य, किशोर साहित्य, शैक्षणिक साहित्य, माता-पिता के लिए तथा चिंतनात्मक साहित्य निम्नवत है।  

 शिक्षण शास्त्र-
1. मांेटेसरी पद्धति 2. वार्तानु‘शास्त्र भाग 1-2
3. बालशिक्षण मने रामभक्त तेम 4. प्राथमिक शाळामां भाषाशिक्षण
5. प्राथमिक शाळामां शिक्षण पद्धतिओं 6. प्राथमिक शाळामां चिट्ठी वाचन
7. प्राथमिक शाळामां शिक्षक 8. प्राथमिक शाळामां कलाकारीगरीमु 
  शिक्षण भाग 1-2
9. दिवास्वपन 10. हालती चालती
11. मा-बापोने 12. श्रा ते शी माथाफोड़ी ?
13. मा-बापु थवुं आकुरुं छे 14. शिक्षक हो तो
15. मा-बापोने प्रश्नो
शिक्षक-
1. स्वतन्त्र बालशिक्षण 2. नवा भाचारो
3. वार्ता कहेनारने 4. बाल-क्रीडांगणो
5. बाल वार्ताओनो विनोद 6. बाळकोनी अपूर्णताश्री श्रने तेना 
  उपायो
7. शहेरमां मोंटेसरी पद्धति 8. वाचनमाळानां केटलाअेक सिद्धान्तों
9. शास्त्रीय दृष्टि 10. घरमां बाळके शुं करवुं ?
11. मोंटेसरी प्रचारमाळा 12. वसंत बालशिक्षण प्रचारमाळा 
  भाग 1-2

चिंतन-

1. प्रासंगिक मननं 2. शांत पळोमां

अक्षरज्ञान योजना-

1. फेम शीश्रययुं 2. चालो वांचीअे
3. श्रागळ वांचो पहेली चोपड़ी 4. आगळ वांचो बीजी चोपड़ी 
5. श्रागळ वांचो त्रीची चोपड़ी

किशोर साहित्य-

1. किशोर कथाओ भाग 1-2 2. धर्मात्माओनां चरित्रो
3.भगवान बुद्ध 4. रखडु’ ढोळी
5. कैलास मानसरोवर दर्शन

बाल साहित्य माला -

चालो प्रवासे ग्रंथ माळा-
1. बाल प्रबासो 2. गुजरात-महाराष्ट्र
3. दादा दर्शने 4. गिरी शिखरो
5. अफ्रिका सांभयु 6. फरवा जइये
7. रोजनीशी 8. खळावाड़ श्रने-

जीवन परिचय ग्रंथमाळा-

1. शेरमां 2. बाल शाळामां
3. कुदरत मां 4. कबाट
5. आंगणामां 6. भों भों भों
7. टपालनी पेटी 8. घरमां

हास्य विनोद ग्रंथमाळा-

1. विनोद टूचका 2. गपगोळा
3. जरा हसो 4. रामजीभाई पड़ी गया
5. बाळकोनी बीरबल-1 6. बाळकोनो बीरबल-2
7. गधेडुं ने घोडुं 8. पेट भरीने हसो

पशु पक्षी ग्रंथमाळा-

1. गधेडुं 2. चीड़ियाखानुं
3. महासभाओं 4. मंगेशनो पोपट
5. मारी गाय 6. मोतियो
7. मारा गोठिया 8. क्यांथी श्राव्यां ?

पाठ पोथी ग्रंथमाळा-

1. नाना पाठो 2.मोटा पाठो
3. जुगतरामना पाठो 4. कमळाबेन ना पाठो
5. शब्द पोथी 6. वाक्य पोथी
7. चिट्ठी पोथी 8. व्याकरण पोथी

ज्ञाननवर्धक ग्रंथमाळा-

1. पूंछं ? 2. सवारथी माँछडीने
3. बाळाकोना लेखो 4. कहेवातोनां मूळ
5. आपणे पोते 6. श्रमे केम ?
7. साजा रहीअे 8. नानी वातो

गाती ग्रंथमाळा-

1. जोड़कणाँ 2. काव्य संग्रह
3. काळा हाथ काळी दाढ़ 4. दूहा ने सोरठा 
5. बरत संग्रह 6. कहेवत संग्रह
7. रमत्र जोड़कणां 8. ऊभुं हतुं ऊभुं हतुं

कथा नाट््य ग्रंथमाळा-

1. बाळ नाटको-1 2. बाळ नाटको-2
3. बुद्ध चरित्र 4. गोपीचन्द
5. छेल्लो पाठ 6. संपादकोनु कथन
7. हरिश्चन्द्र 8. छेटा रेजो, माँ-बाप

रम्य कथा ग्रंथमाळा-

1. गणपति, बापा 2. भीरु श्रने
3. शिवाजी महाराज 4. चेलैयो
5. रुपसिंह श्रने रामसिंह 6. तीरंदाज
7. मकानो ने राक्षस 8. हंस अने हंसा

अवलोकन ग्रंथमाळा-

1. छाणं थापी श्राव्यां 2. श्रोतराती दीवाली-1
3. ओतराती दीवाली-2 4. गाम मां 
5. मामजी जाळ्य 6. वाड़ा मां 
7. घोबीड़ी धुअे छे 8. गामडामां मळजो

बाल कहानी भाग 1 से 10 -

बाल साहित्य गुच्छ-

1. लाल अने हीरा 2. भेंशना शींगडाम।
3. गामडायां गयो हतो 4. आंबो रोप्यो 
5. विलायती बातो 6. टूचकाग्रो
7. बे बाळ नाटको 8. दादाजीनी तलवार
9. तक् तक् तक् तर्र्र् 10. वेठनपो वारो
11. नवां वरतो 12. वसंत आवी
13. तिळ दया गुण दया 14. हेमुभाईना पाठो
15. जीवजंतु 16. ठेकंठेका
17. टेक 18. मेडियो
19. ताराबेनना पाठो 20. माजीअे कहेली
21. ओयुं ने आंख ठरी 22. सटर पटर बातो
23. त्रेवीशमुँ पुष्प 24. चतुर करोळियो
25. पंचामृत

बाल साहित्य वाटिका मंडल पहला-

1. आश्रम वृक्षो 2. जावणुं जोइसे
3. टपाळमां 4. प्रवास वार्ता
5. शब्द चित्रो 6. महमद सेल अने 
7. वन वृक्षो 8. फूदा ने पतंगियां
9. बुधकाका 10. भूतरे गल्प
11. गधेडानां पराक्रमो 12. आपणी लोक कथागों
13. टेकरोनी वनस्पति 14. छ मूखाओ
15. तारा अने ग्रहो 16. ऋतुना रंगो
17. गिरीश भाईनी वार्ताओ-1 18. विज्ञानना दृष्टाओं-1
19. बाळ जोड़कर्णां 20. विज्ञाननी रमतो
21. परीनी वींटी 22. बंगालनी लोक कथाओ
23. विज्ञानना दृष्टााओ-2 24. उदयपुर-मेवाड़
25. गिरीश भाईनी वाताओ-2 28. कुदरत कथाओ


बाल साहित्य वाटिका मंडल दूसरा-

1. मूछाळी मां 2. भ्क्तं वाल भक्त-1
3. शेरलोक होम्सनी वातो 4. भ्क्तं वाल भक्त-2
5. सारोद्वार 6. लोक कथाओ
7. अगन गुलाब 8. सुमल पदमणी
9. लाल मंडळ 10. डहापणनी वातो
11. मंगळनी सफरे 12. तुरंगाने पेले पार
13. मून फलीट 14. विविध माहिती संग्र्रह

अन्य बाल साहित्य - 

1. चालणगाड़ी नानी 2. चालणगाड़ी मोटी
3. मोटी बेन 4. नवी ईसापनीति 
5. ईसपनां पात्री-बघेड़ां 6. कलमनी पींछी थी
7. भेरु 8. सुंदर भेट
9. आंबावाडियुं 10. संुदर वातो
11. खारेक टोपरां 12. हजीय मने सांभरे छे
13. फूलोनी सुगन्ध 14. आफिकानी सफर
15. गिजुभाई ना पाठो 1-2 16. आपणे पापे
17. बाळ लोकगीत संग्रह भाग 1-2
इनके अलावा 
जंगल सम्राट टारजननी अद्भुत कथाओ भाग 1 थी 10

Tuesday, December 4, 2012

शिक्षक की छवि










शिक्षक की छवि 


घुन खाए शहतीरों पर की,
 बाराखड़ी विधाता बांचे

कटी भीत है, छत चूती है,
 आले पर बिसतुइया नाचे

बरसाकर बेबस बच्चों पर,
 मिनट-मिनट में पांच तमाचे

दुखरन मास्टर गढ़ते रहते
 किसी तरह आदम के सांचे।
                       
                     - नागार्जुन

Saturday, November 24, 2012

Live with a simple attitude.



‘‘2 get’’ and ‘‘2 give’’
creates many problems in life.

Just double it.

‘‘4 get’’ and ‘‘4 give’’
solves many problems in life.

Live with a simple attitude.