Monday, April 1, 2019

मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए

मत जियो सिर्फ़ अपनी खुशी के लिए
कोई सपना बुनो ज़िंदगी के लिए।
पोंछ लो दीन दुखियों के आँसू अगर,
कुछ नहीं चाहिए बंदगी के लिए।
सोने चाँदी की थाली ज़रूरी नहीं,
दिल का दीपक बहुत आरती के लिए।
जिसके दिल में घृणा का है ज्वालामुखी
वह ज़हर क्यों पिये खुदकुशी के लिए।
उब जाएँ ज़ियादा खुशी से न हम
ग़म ज़रूरी है कुछ ज़िंदगी के लिए।
सारी दुनिया को जब हमने अपना लिया,
कौन बाकी रहा दुश्मनी के लिए।
तुम हवा को पकड़ने की ज़िद छोड़ दो,
वक्त रुकता नहीं है किसी के लिए।
शब्द को आग में ढालना सीखिए,
दर्द काफी नहीं शायरी के लिए।
सब ग़लतफहमियाँ दूर हो जाएँगी,
हँस मिल लो गले दो घड़ी के लिए।
       ----- उदयभानु ‘हंस’
       

Sunday, March 31, 2019

ईश्वर ही अपना साथी

समझो मत अधिकार किसी पर  अपना फर्ज निभाते जाओ
चाहो मत प्रतिदान किसी से  जो कुछ पास लुटाते जाओ
मन को जितना करोगे छोटा  दुख उतना बढता जायेगा
एक पल आयेगा फिर ऐसा  फिर तू अकेला रह जायेगा
जो भी दोगे वही मिलेगा  सोच समझ के कदम उठाओ
समझो मत अधिकार किसी पर अपना फर्ज निभाते जाओ

बनजारे की तरह रहो तुम  मोह किसी से मत तुम करना
उजड जायेगा डेरा पल मे  आगे अभी सफर है करना
सब हैं तुम्हारे कोई ना तुम्हारा  राधे राधे करते रहना
साथ छोड जायें कब साँसे   साँसो का विश्वास ना करना

एकमात्र ईश्वर ही अपना साथी   उससे ही मन लगाओ 

समझो मत अधिकार किसी पर अपना फर्ज निभाते जाओ


               ------- चंद्र किशोर मिश्र




Saturday, March 30, 2019



मायासागर
माया रूपी सागर में मन रूपी गागर न डुबाओ
भरते भरते सांझ हो गई अब घर वापस लौट के आओ
रंग बिरंगी हाट लगी है, मन पारा सा छलक रहा है
क्या मैं खरीदूं क्या मैं छोड़ूं इस उलझन में तड़प रहा है
है असीम सागर की सीमा थाह का तुम न पता लगाओ
माया रूपी सागर में मन रूपी गागर न डुबाओ
तुमसे पहले आये कितने आकर प्रयत्न किया बहुतेरा
ला न सके प्रकाश रश्मि वे मन का दूर न हुआ अंधेरा
स्वयं प्रकाशित हो पहले से माया का आवरण हटाओ
माया रूपी सागर में मन रूपी गागर न डुबाओ
         ------- चंद्र किशोर मिश्र


           

Thursday, March 28, 2019

Wednesday, March 6, 2019





प्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" जी की जयंती ( 7 मार्च ) पर उनका भावपूर्ण स्मरण।
प्रस्तुत है इस अवसर पर उनकी एक प्रसिद्ध रचना-






उड़ चल हारिल लिये हाथ में
यही अकेला ओछा तिनका
उषा जाग उठी प्राची में
कैसी बाट, भरोसा किन का!

शक्ति रहे तेरे हाथों में
छूट न जाय यह चाह सृजन की
शक्ति रहे तेरे हाथों में
रुक न जाय यह गति जीवन की!

ऊपर ऊपर ऊपर ऊपर
बढ़ा चीर चल दिग्मण्डल
अनथक पंखों की चोटों से
नभ में एक मचा दे हलचल!

तिनका तेरे हाथों में है
अमर एक रचना का साधन
तिनका तेरे पंजे में है
विधना के प्राणों का स्पंदन!

काँप न यद्यपि दसों दिशा में
तुझे शून्य नभ घेर रहा है
रुक न यद्यपि उपहास जगत का
तुझको पथ से हेर रहा है!

तू मिट्टी था, किन्तु आज
मिट्टी को तूने बाँध लिया है
तू था सृष्टि किन्तु सृष्टा का
गुर तूने पहचान लिया है!

मिट्टी निश्चय है यथार्थ पर
क्या जीवन केवल मिट्टी है?
तू मिट्टी, पर मिट्टी से
उठने की इच्छा किसने दी है?

आज उसी ऊर्ध्वंग ज्वाल का
तू है दुर्निवार हरकारा
दृढ़ ध्वज दण्ड बना यह तिनका
सूने पथ का एक सहारा!

मिट्टी से जो छीन लिया है
वह तज देना धर्म नहीं है
जीवन साधन की अवहेला
कर्मवीर का कर्म नहीं है!

तिनका पथ की धूल स्वयं तू
है अनंत की पावन धूली
किन्तु आज तूने नभ पथ में
क्षण में बद्ध अमरता छू ली!

ऊषा जाग उठी प्राची में
आवाहन यह नूतन दिन का
उड़ चल हारिल लिये हाथ में
एक अकेला पावन तिनका!
------ अज्ञेय
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सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" (7 मार्च, 1911 - 4 अप्रैल, 1987) को कवि, शैलीकार, कथा-साहित्य को एक महत्त्वपूर्ण मोड़ देने वाले कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और अध्यापक के रूप में जाना जाता है। इनका जन्म 7 मार्च 1911 को उत्तर प्रदेश के कसया, पुरातत्व-खुदाई शिविर में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहार और मद्रास में बीता। बी.एससी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़कर बम बनाते हुए पकड़े गये और वहाँ से फरार भी हो गए। सन्1930 ई. के अन्त में पकड़ लिये गये। अज्ञेय प्रयोगवाद एवं नई कविता को साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करने वाले कवि हैं। अनेक जापानी हाइकु कविताओं को अज्ञेय ने अनूदित किया। बहुआयामी व्यक्तित्व के एकान्तमुखी प्रखर कवि होने के साथ-साथ वे एक अच्छे फोटोग्राफर और सत्यान्वेषी पर्यटक भी थे।

कविता संग्रह:-
भग्नदूत 1933, चिन्ता 1942,इत्यलम्1946,हरी घास पर क्षण भर 1949, बावरा अहेरी 1954,इन्द्रधनु रौंदे हुये ये 1957,अरी ओ कस्र्णा प्रभामय 1959,आँगन के पार द्वार 1961, कितनी नावों में कितनी बार (1967), क्योंकि मैं उसे जानता हूँ (1970), सागर मुद्रा (1970), पहले मैं सन्नाटा बुनता हूँ (1974), महावृक्ष के नीचे (1977), नदी की बाँक पर छाया (1981), प्रिज़न डेज़ एण्ड अदर पोयम्स (अंग्रेजी में,1946)।[4]

कहानियाँ:
-विपथगा 1937, परम्परा 1944, कोठरीकी बात 1945, शरणार्थी 1948, जयदोल 1951
उपन्यास:-शेखर एक जीवनी-प्रथम भाग 1941, द्वितीय भाग 1944,नदीके द्वीप 1951, अपने - अपने अजनबी 1961।
यात्रा वृतान्त:- अरे यायावर रहेगा याद? 1943,एक बूँद सहसा उछली 1960।
निबंध संग्रह : सबरंग, त्रिशंकु, आत्मनेपद, आधुनिक साहित्य: एक आधुनिक परिदृश्य, आलवाल,
आलोचना:- त्रिशंकु 1945, आत्मनेपद 1960, भवन्ती 1971, अद्यतन 1971 ई.।
संस्मरण: स्मृति लेखा
डायरियां: भवंती, अंतरा और शाश्वती।
विचार गद्य: संवत्सर
नाटक: उत्तरप्रियदर्शी

Tuesday, January 22, 2019

जय हिंद
     नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की जयन्ती  (23 जनवरी 1897)
             पर ऐसे महान व्यक्तित्व को शत - शत नमन


खून हमे दो, आजादी लो ' - यह सुभाष की वाणी है ,
अंकित है इतिहास पटल पर,केवल नहीं कहानी है !
दुश्मन कुटिल आवरण ओढ़े घुस आया है आँगन में,
गले लगाकर छुरा भोंकना उसकी चाल पुरानी है !
आस्तीन में छुपे सांप हैं आओ इन्हें तलाश करें
ढूँढ-ढूँढ कर कुचलें विषधर ऐसी अबकी ठानी है !
व्यक्ति,धर्म का स्वार्थ देखना राष्ट्र-द्रोह से कम है क्या,
बच्चा-बच्चा मातृभूमि का जहाँ रहा अभिमानी है !
मर मिटने की आज जरूरत माँ का आँचल गीला है,
आज देश के लिए उठें वो जिनकी आँख में पानी है !
रचनाकार ----- प्रो. विश्वम्भर शुक्ल

Wednesday, November 14, 2018

गिजु भाई की जयन्ती उनको सादर शत शत नमन


             प्रसिद्ध बालशिक्षाशास्त्री, बालशिक्षा व बाल अधिकारों के लिए सतत संघर्ष करने वाले

                                                       गिजु भाई जी

                        की जयन्ती (15 नवम्बर 1885) पर  उनको सादर शत शत नमन
गिजुभाई को प्राथमिक शिक्षा के प्रथम प्रयोग पुरुष के रुप में जाना जाता है। साथ ही साथ उनके बालक के प्रति वात्सल्य पूर्ण विचारों एवं गाँधी जी के दर्शन को शिक्षा में समावेशित करने के कारण उन्हे मूंछो वाली माँ तथा बालकों के गाँधी कहकर भी पुकारा जाता है।