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Sunday, November 18, 2012

गिजुभाई .. सादगी की प्रतिमूर्ति


गिजुभाई .. सादगी  की प्रतिमूर्ति..    


           गिजुभाई सादगी की प्रतिमूर्ति थे। अपनी लम्बी मूँछो के बीच स्नेह का लहराता सागर जैसा वात्सल्य हृदय किसको अपनी ओर आकर्षित नहीं करता। एक सरल व्यक्तित्व जिसने माँ जैसा हृदय पाया। जिसने शिक्षा की ए बी सी डी अपने हाथों रची, एक महान मनोवैज्ञानिक, जिसने अबोध शिशुओं के हृदय में झांककर बालसेवा की विविध विधाओं को खोजा। गिजुभाई की दृष्टि कितनी पैनी थी, उनकी संवेदनशीलता जो किसी को एक दृष्टि में अपनी ओर आकर्षित कर लेती थी। उनकी मूँछो के बीच चश्मे के तले मन्द-मन्द मुस्कान में कुछ ऐसा जादू था कि जो उनसे बात करता, उसमें बच्चों की सेवा की पे्ररणा उत्पन्न हो जाती। गिजुभाई की बालशिक्षण में रुचि थी। उनके निकट हर कोई उनका शिक्षक था। वे सबसे सीखने को तैयार रहते थे। वे बालक से हर क्षण कुछ सीखना चाहते थे, वह बच्चों के बीच रहते, उनके साथ उन्हें जो मिलता, उनके जैसे व्यवहार होते, उन्ही के अनुसार उनकी शिक्षा पद्धति बनती। उनका दर्शन अलौकिक था। सच्चे अर्थों में वे फकीर थे। जीवन का नया प्रकाश उन्होने खोजा। बालकों की शिक्षा के लिए बालमन्दिरों की स्थापना की। यह कार्य उन्होने वाहवाही लूटने के उद्देश्य से नहीं किया था। किसी के द्वारा प्रशंसा किए जाने पर वे कहते थे ‘‘यह अपने बस का रोग नहीं है।’’