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Monday, November 12, 2012

युवा शक्ति और ग्रामीण भारत

 युवा शक्ति और ग्रामीण भारत
                                                                    

                            प्रत्येक देश का भविष्य निश्चित रूप से वहाँ की युवा पीढ़ी पर आधारित होता है। महादेवी वर्मा ने कहा है - ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है,जिसकी तरूणाई सबल होती है, जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरूणाई है।’’ अर्थात यह सत्य है कि किसी भी राष्ट्र और समाज की सारी ऊर्जा उसकी युवा शक्ति में निहित होती है। जो राष्ट्र अपनी युवा शक्ति का बेहतर और नैतिक इस्तेमाल करता है, बह आगे बढ़ता है और जो ऐसा नहीं कर पाता, वह अपनी तमाम अच्छाइयों, विशिष्टताओं के बावजूद उस दौड़ में पीछे रह जाता है जिसे हम निर्माण और विकास की दौड़ कह सकते हैं। समय-समय पर विश्व के सभी उल्लेखनीय महापुरुषों ने अपने देश और समाज के निर्माण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया है। न केवल स्वीकार किया है, बल्कि इसके लिए युवाओं का आह््वान भी किया है। भारत में अनादिकाल से सभ्यताओं के निर्माण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास के पन्नो पर नजर डालें तो दृष्टिगत होता है कि चाणक्य ने एक अखण्ड भरत का सपना देखा था जिसे वह चंद्रगुप्त जैसे युवा के माध्यम से से ही साकार कर सका था। पराधीन भारत में भी युवा शक्ति की नैतिक, आध्यात्मिक और सृजनात्मक शक्ति को जागृत करने का स्वामी विवेकानन्द  का विश्वविख्यात व्याख्यान ’उठो जागो‘ भी युवा शक्ति को ही समर्पित था। विवेकानन्द की दृष्टि से महात्मा गंाधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर,जैसे महापुरूषों ने युवाओं को देखा था और उन्हे राष्ट्र और समाज के लिए प्रेरित किया था। आजाद भारत में युवा शक्ति को संपूर्ण क्रान्ति का आधार बनाने के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के प्रयास भी कम नहीं रहे। वे संपूर्ण क्रंाति के एक चरण अर्थात सत्ता परिवर्तन में सफल भी हुए। उनकी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी युवाओं में उनके विश्वास का द्योतक थी।
       लेकिन आज प्रश्न यह है कि युवा शक्ति को संभालने और दिशा देने की सामथ्र्य किसमे है जबकि  वर्तमान भारतवर्ष में 13 से 35 वर्ष की आयु वाले लगभग 42 करोड़ यूवाओं की मानवीय पूँँजी है जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक है अर्थात हमारा देश इन दिनो सर्वाधिक युवा देश है जिसमें से 70 प्रतिशत (लगभग 29 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं। गाॅव में रहने वाले युवाओं तथा  शहरों में निवास करने वाले लगभग 13 करोड़ युवा दोनो के रहन-सहन, क्षमता, रूचि, परिवेश, शिक्षा आदि एकदम अलग है। गाॅवो की शिक्षा व्यवस्था और शहरों की सुविधाए, दोनो में जमीन-आसमान का फर्क है। इसलिए ग्रामीण युवाओं को आज शिक्षा एवं रोजगाार के पर्याप्त अवसर प्राप्त नही हो पा रहे हैं और वे विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे हैं। जबकि किसी भी राष्ट्र की युवा शक्ति उसके रचनात्मक कार्यो का आधार होती है परन्तु जब युवाओं को अपनी योग्यता व शक्ति का सदुपयोग करने का अवसर नही मिलता तो वह अपने वास्तविक मार्ग से भटक जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में युवा शक्ति रचनात्मक कार्यो में व्यस्त न रहकर विध्वंसक कार्यो की ओर अग्रसर होतीे है।
आज हमारे देश में ग्रामीण युवा शक्ति के सामने अनेक गम्भीर चुनौतियां हैं जिनमें आर्थिक विषमता, मूल्यरहित शिक्षा, शिक्षा का रोजगारोन्मुखी न होना, उचित मार्गदर्शन का अभाव एवं टेलीवीजन के द्वारा सेक्स और हिंसा का ग्लैमराइजेशन किया जाना आदि हैं। जिसके कारण उत्पन्न अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, टूटते सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों ने इन युवाओं के भीतर निराशा पैदा कर दी है। आज हमारे देश में उचित मार्गदर्शन के अभाव में भारतीय युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है और कुप्रवृत्तियों की पगडंडियो में भटककर अपराध और आतंकवाद पर चल रही है। कश्मीर में जारी आतंकवादी गतिविधियों तथा देश के कोने-कोने में पैर पसारते नक्सलवाद में गुमराह युवा वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अतिरिक्त देश की बढ़ती जनसंख्या ने भी युवा वर्ग को दिशा से भटकने के लिए मजबूर कर दिया है। इन समस्याओं का निदान किए बिना युवा शक्ति को राष्ट्रª विकास के कार्यो से संलग्न कर पाना संभव न हो सकेगा।
   
ऽ    आर्थिक विषमता भी युवाओं को मार्ग से भटकाने में प्रेरक तत्व है। आज देश में अधिकांश पूँँजी चंद हाथों में है जबकि अधिकांश ग्रामीण युवा निर्धन व अशिक्षित  परिवारों से संबन्धित है। धन के अभाव में ये ग्रामीण युवक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं और इनकी प्रतिभा को उचित अवसर नहीं प्राप्त हो पाता है। इसके अतिरिक्त देश की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। कृषि योग्य भूमि बढ़ते परिवारों के साथ टुकड़ों में बंटती जा रही है। कृषि से जीवन-यापन संभव नहीं रह गया है। फलस्वरूप युवा वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर है। शहरो में आकर ये युवक मजदूरी कर अपना पेट भरते हैं। जहाँँ पर वे शहरी चकाचैंध से परिचित होते है और भौतिक सुखसुविधाओं की प्राप्ति हेतु गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं।

ऽ      वर्तमान शिक्षा युवाओं को परिश्रम से दूर करती है। अल्प शिक्षा प्राप्त ये युवक कृषि व संबन्धित कार्य करने में शर्मिन्दगी महसूस करते है। “थोड़ा पढ़ा तो गया हल से, ज्यादा पढ़ा तो गया घर से “ कहावत इन पर चरितार्थ होती है। ये युवक कृषि के बजाए नौकरी प्राप्त करने में अपने भविष्य को अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। जिन युवकों की ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त होता है, वे जल्द से जल्द शहरी क्षेत्रों में स्थानान्तरण कराने का प्रयास करते हैं ताकि शहरी जीवन का लाभ उठा सकें।


ऽ      वर्तमान शिक्षा युवाओं में नैतिक मूल्यों का विकास करने में असफल सिद्ध हो रही है। शिक्षा एक व्यवसाय नहीं, वरन् संस्कार है। परंतु आज की शिक्षा व्यवसाय ज्यादा नजर आती है। युवा वर्ग कालेजो के माध्यम से ही दुनिया को देखता है। पर शिक्षा में सामाजिक व नैतिक मूल्यों का अभाव होने के कारण वह न तो उपयोगी प्रतीत होती है और न ही युवा वर्ग इसमें  कोई खास रूचि लेता है। शिक्षा का सीधा संबंध नौकरी या रोजगार से जुड़ गया है। ऐसे में शिक्षा की व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगने लगाा है।ऐसे में युवा वर्ग की सक्रियता हिंसात्मक कार्यौ, उपद्रव , हड़तालों, अपराधों और अनुशासनहीनता के रूप में ही दिखाई देती है। शिक्षा में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के अभाव ने युवाओं को नैतिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन की ओर अग्रसर किया है।मसलन मादक द्रव्यों व धू्रमपान की आदतें, यौन शुचिता का अभाव आदि ने विद्यालयों को विद्यास्थल के बजाए राजनीतिक अखाड़ा, असामाजिक व अनैतिक कार्यौ की जन्मस्थली बना दिया है। दुर्भाग्यवश आज के गुरूजन भी प्रभावी रूप् में सामाजिक व नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में असफल रहे।

ऽ      युवाओं के समक्ष एक अन्य चुनौती उचित मार्गदर्शन का अभाव है। आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर जब नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या? किसी दौर में युवाओं  के आदर्श गांधी, नेहरू, विवेकानन्द, आजाद, सुभाष जैसे लोग या उनके आसपास के सफल व्यक्ति, वैज्ञानिक और शिक्षक रहे। पर आज के युवाओं के आदर्श वही हैं जो शार्टकट के माध्यम से ऊॅचाइयों पर पहुॅच जाते हैं। फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, विश्वसुन्दरियां, भ्रष्ट अधिकारी, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ और अपराध जगत के डान आदि उनके आदर्श बन गए हैं। फलस्वरूप अपनी संस्कृति के प्रतिमानो और उद्यमशीलता को भूलकर रातोरात ग्लैमर की चकाचैंध में वे शीर्ष पर पहुॅचना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, उसी प्रकार बिना उद्यम के ठोस कार्य भी नहीं हो सकता। कभी देश की आजादी में युवाओं ने अहम भूमिका निभाई और जरूरत पड़ने पर नेतृत्व भी किया। कभी विवेकानन्द जैसे व्यक्तित्व ने युवा कर्मठता का ज्ञान दिया तो सन् 1977 में लोकनायक जयप्रकाश के आह्नान पर सारे देश के युवा एक होकर सड़कों पर निकल आए। पर आज वही युवा अपनी शक्तियों को भूलकर चन्द लोगो के हाथ का खिलौना बन गए हैं और भ्रष्ट व्यक्तियों को आदर्श मानकर गलत रास्तों पर चल पड़े हैं।

ऽ      आज का युवा संक्रमण काल से गुजर रहा है। वह अपने बलबूते पर आगे बढ़ना चाहता है, पर परिस्थितियां और समाज उसका साथ नहीं देते। चाहे वह राजनीति हो, फिल्म व मीडिया जगत हो, शिक्षा हो, उच्च नेतृत्व हो, हर किसी ने उसे सुक्षद जीवन के सपने दिखाये और उसको भॅवर में छोड़ दिया। ऐसे में पीढि़यों के बीच जनरेशन गैप भी बढ़ा है। समाज की कथनी-करनी में भी जमीन-आसमान का अन्तर है। एक तरफ वह सभी को डिग््राीधारी देखना चाहता है, पर उन सबको रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाता। नतीजन निर्धनता, मंहगाई, भ्रष्टाचार इन सभी की मार सबसे पहले युवाओं पर पड़ती है। इसी प्रकार व्यावहारिक जगत में आरक्षण, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, भाई-भतीजावाद और कुर्सी की लालसा जैसी चीजों ने युवा हृदय को झकझोर दिया है। ज बवह देखता है कि योग्यता और ईमानदारी से कार्य संभव नहीं है, तो कुण्ठाग्रस्त होकर वह गलत रास्ते पर चल पड़ता है। निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में ही समाज के दुश्मन उसकी भावनाओं को भड़काकर व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह के लिए पे्ररित करते हैं। फलतः अपराध और आतंकवाद का जन्म होता है।


ऽ      युवाओं को प्रभावित करने में फिल्मी दुनिया  और विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ रहा है, पर इसके सकारात्मक तत्वों के बजाए इसके नकारात्मक तत्वों ने ही युवकों को ज्यादा प्रभावित किया है। फिल्मी पर्दे पर हिंसा, बलात्कार, प्रणय दृश्य, यौन उच्छ्श्रंखलता एवं रातांेरात अमीर बनने के दृश्यों को देखकर आज का युवा उसी जिन्दगी को वास्तविक रूप में जीना चाहता है। फिल्मी पर्दे पर पहने जाने वाले अधोःवस्त्र ही आधुनिकता का पर्याय बन गए हैं। वास्तव में पर्दे का नायक आज के युवा की कुण्ठाओं का विस्फोट है। पर युवा वर्ग यह नहीं सोचता कि पर्दे की दुनिया वास्तविक नही हो सकती। पर्दे पर अच्छा काम करने वाला नायक वास्तविक जिन्दगी में खलनायक भी हो सकता है।

                   आज समाज और राष्ट्र के बिखरे हुए ऊर्जा के स्रोत युवाओं को संगठित और अनुशासित करके उनकी ऊर्जा को किसी सकारात्मक लक्ष्य और समाज उत्थान के कार्य हेतु अगर प्रयोग में लिया गया तो यह युवा शक्ति हर लक्ष्य को भेदती हुई सफलता के नए आयाम गढ़कर देश और समाज को हिमालय की बुलंदियों तक पहुचा सकेगें। इसके लिए उचित शिक्षा, सही मार्गदर्शन एवं अभिभावक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ताओं व सरकारी तंत्र के पारस्परिक समन्वय की महती आवश्यकता है। अतएव शिक्षा को रोजगारपरक, हिंसामुक्त, क्रियाशील, मूल्यपरक एवं प्रकृति से सम्बन्धित करके ही निर्भय, स्वानुशासित, अहिंसात्मक जीवन दृष्टि वाले, आत्मनिर्भर, सहकारप्रिय एवं गीता में वर्णित ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ (अपने भीतर स्वयं से तृप्त) युवाओं का निर्माण किया जा सकता है। ऐसे युवकों के द्वारा ही देश में सामाजिक सौहार्द्र ,सुख-शान्ति व समृद्धशाली समाज की स्थापना की जा सकती है जिसके द्वारा ही आधुनिक सभ्यता के उज्जवल भविष्य का सपना साकार हो सकेगा।
  


Sunday, October 2, 2011

युवा शक्ति और शिक्षा

                      युवा शक्ति और शिक्षा 
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 2& ;kstuk ¼ekfld½] flrEcj] 2009    
 3& f”k{kd izHkk ¼ekfld½] tqykbZ & 2009
  5—www.rachnakar.blogspot.com/2007/10
  6- czãopZl] f”k{kk vkSj fo|k
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