Wednesday, November 14, 2012

गिजुभाई जन्मदिवस


     15 नवम्बर 1885
गिजुभाई के जन्मदिवस पर सभी बालस्नेही शिक्षकों, अभिभावकों को    हार्दिक शुभकामनाएं

प्रसिद्ध बालशिक्षाशास्त्री, बालशिक्षा व बालअधिकारों के लिए सतत संघर्ष करने वाले गिजुभाई को प्राथमिक शिक्षा के प्रथम प्रयोग पुरुष, भविष्य की पीढ़ी के निर्माता आदि के रुप में जाना जाता है। साथ ही साथ उनके बालक के प्रति वात्सल्य पूर्ण विचारों एवं गाँधी जी के दर्शन को शिक्षा में समावेशित करने के कारण उन्हे मूंछो वाली माँ तथा बालकों के गाँधी कहकर भी पुकारा जाता है।

गिजुभाई : स्वच्छता एवं स्वास्थ्य

  गिजुभाई :  स्वच्छता एवं  स्वास्थ्य        गिजुभाई :  स्वच्छता एवं  स्वास्थ्य                                                                                               
       

          बच्चे किसी भी राष्ट्र की अमूल्य निधि माने जाते हैं। यही बच्चे देश का भविष्य भी होते हैं। लेकिन देश के भविष्य को गढ़ने वाले बच्चे कहीं कुपोषण का शिकार हो रहे हैं, तो कहीं फूलों के समान कोमल शरीर को घरों और विद्यालयों के अस्वच्छ वातावरण में रहना पड़ता है। फलस्वरूप खेलने, कूदने और पढ़ने की उम्र में इन्हें रोगों से जूझना पड़ता है जो कि बाल मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। अशिक्षित परिवारों में बच्चों के प्रति बरती जा रही लापरवाही बच्चों के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालती है। प्रसिद्ध शिक्षाशात्री हरबर्ट स्पेन्सर ने कहा है- ‘‘किसी राष्ट्र का स्वास्थ्य उसकी संपदा से ज्यादा महत्वपूर्ण है।‘‘ स्वास्थ्य बच्चे के समग्र विकास का सूचक होता है। यह बालक की स्कूल में उपस्थिति, नामांकन और पढ़ाई पूरी करने की क्षमता को प्रभावित करता है। बालक का अपना स्वभाव, खानपान, शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य का अभाव उसे ऐसे रोगों की ओर ढकेल देता है। जो प्रायः विद्यार्थी जीवन में नहीं होने चाहिए। आज छोटे-छोटे बच्चों में तनाव, अवसाद, नेत्ररोग, कुपोषण, मोटापा आदि रोगों का होना एक गहन चिंता का विषय बनता जा रहा है। आज शिक्षाविद् इस बात पर बल दे रहे हैं कि बालक को शारीरिक रूप से सबल तथा मानसिक रूप से स्वस्थ बनाने की आवश्यकता है। अगर बालक स्वस्थ है एवं उसके स्वभाव के अनुरूप रूचिपूर्ण, गुणवत्ता आधारित शिक्षा उसे मिल रही है तो वह निश्चित ही शनैः शनैः प्रगति के पथ पर अग्रसर होगा। रूचि व आनन्द के साथ सीखना और कामयाबी विद्यार्थी जीवन का एक सच है। इस सच  की प्राप्ति में स्वस्थ विद्यार्थी एक आवश्यक मूलमंत्र है। एन0 सी0 ई0 आर0 टी0 का अध्यापक शिक्षा एवं विस्तार विभाग बालकों के उत्तम स्वास्थ्य हेतु निरंतर प्रयासरत है। इस हेतु शारीरिक शिक्षा पर बल तथा अध्यापकों के प्रशिक्षण में स्वच्छता एवं स्वास्थ्य जैसे विषय शामिल किए गए हैं। इस संबंध में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 में कहा गया है- ‘‘स्वास्थ्य और शारीरिक शिक्षा को अन्य विषयों के समान दर्जा दिए जाने की जरूरत है।‐‐‐इस क्षेत्र में शिक्षक की तैयारी योजनाबद्ध हो और संयुक्त प्रयास किए जाएं। इसके विषय क्षेत्रों, जिसमें स्वास्थ्य शिक्षा, शारीरिक शिक्षा और योग आते हैं, को उपयुक्त ढंग से प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के सेवा पूर्व शिक्षक प्रशिक्षण  पाठ्यक्रमों से जोड़ा जाए। वर्तमान शारीरिक शिक्षा प्रशिक्षण संस्थानों की पर्याप्त समीक्षा की जाए और उसका उपयोग  किया जाए। इसी प्रकार स्कूल मे योग की शिक्षा के लिए उचित  पाठ्यक्रम और शिक्षक प्रशिक्षण की पद्धति अपनाई जाए।  यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि इन पहलुओं को राष्ट्रीय सेवा योजना, स्काउट एवं गाइड और एनसीसी से जोड़ा जाए।’’
        महान दार्शनिक अरस्तू का कथन है- ‘‘स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है।’’ आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व गिजुभाई ने भी बालक की उचित शिक्षा हेतु उनकी स्वच्छता और स्वास्थ्य को महत्वपूर्ण व आवश्यक माना था। उनका मानना  है कि स्वच्छ और स्वस्थ बालक का विकास सहज और स्वाभाविक ढंग से होता है। बालक के उचित स्वास्थ्य के लिए वे विद्यालय, शिक्षक तथा माता-पिता तीनों की सकारात्मक भूमिका की आवश्यकता महसूस करते हैं।
         गिजुभाई स्वस्थ बालक के निर्माण हेतु विद्यालय की स्वच्छता को आवश्यक मानते हैं। वे गन्दगी से पटे विद्यालयों को देखकर अत्यंत दुखी हो जाते हैं। उन्होने तत्कालीन प्राथमिक विद्यालयों का निरीक्षण किया और पाया कि किसी विद्यालय में पूरा आंगन कबूतरों की बीट से सड़ा हुआ था और उन्ही पर बालक चल रहे थे या बैठे थे। एक अन्य विद्यालय में एक अंधेरी सीलन भरी कोठरी थी। विद्यालय में हवा और रोशनी का पूर्ण अभाव था। उन्होने विद्यालयों की दयनीय स्थिति को देखकर कहा- ‘‘ऐसी गंदी, हवा और रोशनी से रहित शालाएं बालकों के लिए जीवित नरक है; उन्हे पहले ही झटके में रोग का शिकार बनाने वाली भयंकर रोग-शालाएं है।’’
          गिजुभाई गंदगी को राष्ट्रªªीय कलंक मानकर उसके विरूद्ध लड़ाई छेड़ने का आह्नान करते हैं- ‘‘आजकल हमारे देश में गंदगी का बोलबाला है। गंदगी हमारा एक राष्ट्रªªीय कलंक है। जब तक इसका साम्राज्य है, हमारी दुर्दशा का अंत नहीं होगा। हमें अपनी गंदगी दूर करने के लिए नियमानुसार लड़ाई छेड़नी पड़ेगी।’’ गिजुभाई की मान्यता है कि छात्रों को पहला पाठ साफ रहने का ही सिखाना चाहिए। उनके विचार से- ‘‘मैले-कुचैले और बेढंगे लड़कों की पहली पढ़ाई और क्या हो सकती है।‐‐‐ जब तक हमारा कमरा भली-भांति साफ नहीं होता, हम कमरे में दूसरा काम नहीं कर सकते।’’
        गिजुभाई जानते थे कि विद्यालय बच्चों के लिए रोचक और मनभावन तभी बन सकता है जबकि वह साफ-सुथरा और सौंदर्य की किरणों से आलोकित हो। अतः गिजुभाई शाला की सफाई के लिए व्यापक आन्दोलन चलाने का संकल्प लेते हैं- ‘‘आखिर मै तो पाठशाला के अन्दर जितनी कोशिशें हो सकेगी, करूँगा। बालकों में वैसी आदतें पैदा करूँगा। यही नहीं, फुर्सत मिलने पर इस संबंध सार्वजनिक रूप से आंदोलन भी करूँँगा। सच तो यह है कि लोग कितने ही बेपरवाह क्यों न हों, इसमें शक नहीं कि हमारे विद्यालयों का यह गंदा वातावरण हजारों रोगों का घर है। इसको हमें  मिटाना पड़ेगा।’’
        गिजुभाई के अनुसार, विद्यालय के अंदर भले ही आकर्षक चित्र अथवा शिक्षण उपकरण कम मात्रा में ही हों, लेकिन विद्यालय का वातावरण पूर्णतया स्वच्छ होना चाहिए। वे कहते है- ‘‘अगर ये विद्यालय आज स्वच्छ होंगे तो कल इनमें से पढ़कर निकलने वाले बालक शहरों और समाज को स्वच्छ रखेंगे। अगर आज की शालाए रोगाणुओं को जन्म देने का स्थान नहीं बनेगी तो आने वाले कल का समाज रोगमुक्त होगा।’’ गिजुभाई बालक के उत्तम स्वास्थ्य हेतु शिक्षकों की भूमिका को महत्वपूर्ण मानते हैं। वे शिक्षकों से बालकों के माता-पिता को स्वच्छता के प्रति जागरूक करने की बात कहते हैं- ‘‘ माता-पिता अपने बालकों को बाल्यावस्था में तुच्छ मानकर गंदे, अस्वच्छ, बिखरे बाल, सड़ी टोपी और बढ़े नाखून, बहती नाक और मैले-कुचैले ही विद्यालय में भेज देते हैं। हम इसे हर्गिज बरदाश्त न करें। ऐसे बालकों को हम माता-पिता के घर वापिस लौटा देंगे और माता-पिता के विरूद्ध लड़ाई ठान लेंगे। यह लड़ाई हमारे स्वार्थ की नहीं, सिर्फ माता-पिता के भले की है। इससे माता-पिता को समझना ही पड़ेगा और उनकी लापरवाही में कमी आएगी।’’
        गिजुभाई बालक के अंगों की स्वच्छता के लिए बालकों का ध्यान विभिन्न अंगों की सफाई की ओर आकृष्ट करने पर बल देते हैं और धीरे-धीरे उनकी सफाई की आदतें डालने के लिए कहते हैं- ‘‘कपड़ों की स्वच्छता आवश्यक है पर अधिकांशतः वह बाहरी स्वच्छता ही कही जाएगी।  धीरे-धीरे हम बालक का ध्यान नख, कान तथा दांतो की सफाई की ओर खींचते रहें। हमें यह बताना चाहिए कि हाथ वगैरह साफ-सुथरे कैसे रखें। बार-बार वे ऐसा करते रहें, ऐसा प्रयत्न हमें करते रहना चाहिए।हमे उनमे ऐसी आदत डालनी होगी कि वे स्वच्छ रहे बिना रह ही न सकें और इसके लिए घर में साधन-सामग्री रखें- उदाहरण के लिए ट्वाल, साबुन, पावदान,कांच, कंघा वगैरह। ये उपकरण अपने आप में बहुत स्वच्छ हों और स्वच्छता के कारण ही आकर्षक हों। पेशाब करने या शौच जाने की जगहें भी तय होनी चाहिए और इस संबंध में बालकों की अच्छी आदतें डालने का हमें आग्रह रखना चाहिए। जूते खोलने, कचरा डालने या कागज फेंकने की बुरी आदतों को भी व्यवस्थित करना चाहिए। हाथ और नाक की स्वच्छता को हमे बढ़ाना होगा जिससे कि बालक नाक या मुँँह में उंगली न डाले और जहां-तहां न थूके।’’         
           विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों ने बालक के स्वास्थ्य और शाला की स्वच्छता पर विचार व्यक्त किए है। लेकिन गिजुभाई ने बालक के साथ-साथ शिक्षक और माता-पिता के स्वास्थ्य रक्षण पर भी ध्यान केन्द्रित किया है। गिजुभाई का मानना है कि बालक अनुकरण से सीखता है। यदि शिक्षक और माता-पिता द्वारा अपने स्वास्थ्य और स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है तो बालक भी उनका अवलोकन करके स्वच्छ रहने का प्रयास करेगा।
          गिजुभाई ने शिक्षक के स्वास्थ्य की महत्ता के बारे में लिखा है- ‘‘शिक्षक शाला का आधार-स्तम्भ है। उसी पर शाला की सुदृढ़ता व स्थिरता निर्भर करती है। आधार-स्तम्भ जितना सुदृढ़ और स्वस्थ होगा, उतनी ही शाला की दशा स्वस्थ होगी।’’ उनके अनुसार, एक स्वस्थ सुदृढ़ मनःस्थिति वाला शिक्षक अपने आप में चेतनायुक्त वातावरण होता है। जबकि वृद्ध और बीमार मानसिकता वाला शिक्षक निरूत्साह, थकान और बीमारी का वातावरण सृजित करता है। गिजुभाई के विचार से शारीरिक स्वच्छता का अर्थ है बालों, त्वचा, नाखून, कपड़े आदि साफ रखना। इसमें पैसों के बजाए परिश्रम की ज्यादा जरूरत रहती है। गिजुभाई शिक्षकों को स्वस्थ रहने के लिए प्रातः स्वच्छ हवा में घूमने के लिए जाने, व्यायाम करने, दंड-बैठक लगाने या सूर्य नमस्कार करने का सुझाव देते हैं। वे शिक्षकों को बताते हैं कि सीधा बैठना और लंबी सांस लेना, यह तंदुरूस्ती की कंुजी है।
          गिजुभाई शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ शिक्षक के मानसिक स्वास्थ्य को भी महत्वपूर्ण मानते हैं। वे कहते हैं- ‘‘ सशक्त शरीर को निर्मल मन  से दुगना सशक्त, सुंदर और गंधमय बनाने के लिए मन का स्वास्थ्य बड़े महत्व की चीज है।’’ उत्तम मानसिक स्वास्थ्य हेतु गिजुभाई शिक्षकों से निंदा रूपी रोग से मुक्त होने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि निंदा से व्यक्ति के ज्ञानतंतु उत्तेजित होते हैं, साथ ही वे क्षीण और शोकग्रस्त बनते हैं और उनकी प्रतिध्वनि मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ती है। इसके अतिरिक्त मानसिक स्वास्थ्य के लिए शिक्षक को निर्भयता की उपासना करनी चाहिए। उच्च अधिकारियों से डरना, उनकी खुशामद करना- यह सब भयभीत मनःस्थिति का सूचक है। गिजुभाई शिक्षक के स्वास्थ्य के बारे में कहते हैं- ‘‘ जो शिक्षक प्रेम से पढ़ाता है, वह सर्वोत्तम मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करता है और स्वयं अर्जित करता है।’’ गिजुभाई का विचार है कि तन व मन की नियमितता और अनुशासन में स्वस्थ जीवन का मूल निहित है। इसके अलावा अपने स्वास्थ्य की चिंता करने वाले शिक्षक को संगीत प्रेमी होना चाहिए तथा उसे कला-दर्शन की इच्छा रखनी चाहिए। वे शिक्षकों को देश की मिल्कियत मानते हैं।उनका विचार है कि देश को शिक्षकों के शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य की जितनी रक्षा ेकरनी चाहिए, उतनी ही उन्हे स्वयं अपनी भी करनी चाहिए। वे शिक्षकों से कहते हैं कि याद रखें- ‘‘आर्थिक दशा चाहे अच्छी हो या न हो, परंतु शरीर को निरोग रखने के अपने कर्तव्य से आप कभी न चूकें। अगर शरीर व्यसनो से मुक्त है तो वह सर्वप्रथम निरोग है। ओछी वृत्ति तथा गंदे विचारों से अगर मन मुक्त है तो वह स्वस्थ है।’’
         शिक्षकों के साथ-साथ गिजुभाई माता-पिता के उत्तम स्वास्थ्य व स्वच्छता को भी आवश्यक मानते हैं। अगर माता-पिता सफाई पसंद होंगे, तो बालक भी उनका अवलोकन करके साफ-सफाई को आदत के रूप में ग्रहण करेंगे। गिजुभाई का मानना है कि शारीरिक रूप से स्वस्थ माता-पिता ही बालक की उचित देखभाल कर सकते हैं। वे कहते हैं- ‘‘शारीरिक स्वास्थ्य से सुखी माता-पिता ही अपने बालकों की अच्छी सार-संभाल कर सकेंगे, और खुद भी बालकों के सुख का आनन्द लूट सकेंगे। आज की अस्वस्थ और दुर्बल माताओ के लिए बालक भार रूप और दुःख रूप बन जाते है।’’ 
          इसके अतिरिक्त गिजुभाई ने छोटी वय के बच्चों के शारीरिक विकास पर भी ध्यान केंद्रित किया। उनका विचार था कि इन बच्चों के शारीरिक विकास के लिए जितना ध्यान दिया जाए, उतना कम है। वे प्राथमिक शाला में जाकर पढ़ने लगें, उससे पहले उनके शरीर पुष्ट व बलवान हो जाने चाहिए। इस हेतु गिजुभाई ने तीन से सात वर्ष की उम्र के बच्चों के शारीरिक विकास के लिए बाल क्रीड़ांगन का विचार रखा। जहाॅ पर बच्चों को अंगरक्षण तथा स्वच्छता हेतु हाथ-मुँँह धोना और कपड़े पहनना सिखाना, गंदे व फटे कपड़ों के प्रति अरूचि उत्पन्न करना, बाल, आॅख, नाक, कान, दाँत आदि स्वच्छ रखना आदि सिखाया जाना चाहिए। इसके अलावा शारीरिक बल, स्फूर्ति तथा आनन्द की कसरतें एवं क्रीड़ाएं कराई जाए जैसे रेत का अखाड़ा जिसमें बालक दौड़े, कूदें लोटे और पड़े रहें। साथ ही बच्चों को सामाजिक जीवन के योग्य बनाने के लिए शिक्षाप्रद जानकारी दी जाए जैसे कैसे बैठें, किस तरह से बात करें, कचरा कहा डालें आदि।
         गिजुभाई ने स्वच्छ विद्यालय और बालक, शिक्षक एवं माता-पिता के उचित शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य के लिए केवल विचार ही प्रस्तुत नहीं किए, वरन् उनको अपने बालमंदिर व अध्यापन मंदिर के माध्यम से लागू भी किया। बालमंदिर के बारे में गिजुभाई लिखते हैं- ‘‘गाॅवो से आने वाले बालक यहां पर अन्य विद्यालयों वाली कठोरता, अंधकारपूर्ण वातावरण तथा गंदगी से मुक्त थे। उनके लिए सुंदर हाॅल था, ताजी हवा थी, खेलने को बगीचा था।’’ इसके अतिरिक्त बालमंदिर में शिक्षण में जीवन व्यवहार के कामों को भी पर्याप्त स्थान दिया गया था। जिसमे नाश्ता करना, परोसना, बर्तन साफ करना, आंगन व कमरा साफ करना, बगीचे में काम, हाथ-पाॅव धोना, कंघी करना, छोटे- छोटे कपड़े धोना, कपड़े पहनना और उतारना आदि कार्य बालमंदिर की शिक्षा के अंग थे। अध्यापन मन्दिर में प्रशिक्षण प्राप्त शिक्षकों के माध्यम से गिजुभाई की स्वच्छ विद्यालय की संकल्पना और  स्वस्थ बालक, स्वस्थ शिक्षक एवं स्वस्थ माता-पिता संबंधी बिचार सम्पूर्ण देश में फैल गए।
         गिजु भाई के स्वच्छता एवं स्वास्थ्य संबंधी विचार न केवल मनोविज्ञान के सिद्धान्तों पर खरे उतरतें हैं, वरन् बालकों में स्वच्छता एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी अच्छी आदतों का समावेश भी करते हैं।  आज भारत में शिक्षा के विभिन्न स्तरों पर स्वास्थ्य शिक्षा, शारीरिक शिक्षा और योग को पाठ्यक्रम में शामिल करके बालकों की स्वच्छता एवं स्वास्थ्य रक्षण का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है जो कि गिजुभाई के विचारों की प्रासंगिकता को सिद्ध करता है। यदि इन विचारों का अनुशीलन करते हुए शिक्षा की व्यवस्था की जाए तो निश्चित रूप से स्वच्छ विद्यालय और स्वस्थ बालक की संकल्पना को साकार करने में सफलता मिलेगी जिससे न केवल शिक्षा का वर्तमान सुधरेगा, वरन् भविष्य भी सुधरेगा। ऐसे शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वस्थ एवं स्वच्छताप्रिय बालकों के द्वारा ही स्वस्थ, शिक्षित एवं सुदृढ़ भारत का निर्माण सम्भव हो सकेगा।

Monday, November 12, 2012

युवा शक्ति और ग्रामीण भारत

 युवा शक्ति और ग्रामीण भारत
                                                                    

                            प्रत्येक देश का भविष्य निश्चित रूप से वहाँ की युवा पीढ़ी पर आधारित होता है। महादेवी वर्मा ने कहा है - ‘‘बलवान राष्ट्र वही होता है,जिसकी तरूणाई सबल होती है, जिसमें मृत्यु को वरण करने की क्षमता होती है, जिसमें भविष्य के सपने होते हैं और कुछ कर गुजरने का जज्बा होता है, वही तरूणाई है।’’ अर्थात यह सत्य है कि किसी भी राष्ट्र और समाज की सारी ऊर्जा उसकी युवा शक्ति में निहित होती है। जो राष्ट्र अपनी युवा शक्ति का बेहतर और नैतिक इस्तेमाल करता है, बह आगे बढ़ता है और जो ऐसा नहीं कर पाता, वह अपनी तमाम अच्छाइयों, विशिष्टताओं के बावजूद उस दौड़ में पीछे रह जाता है जिसे हम निर्माण और विकास की दौड़ कह सकते हैं। समय-समय पर विश्व के सभी उल्लेखनीय महापुरुषों ने अपने देश और समाज के निर्माण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को स्वीकार किया है। न केवल स्वीकार किया है, बल्कि इसके लिए युवाओं का आह््वान भी किया है। भारत में अनादिकाल से सभ्यताओं के निर्माण में युवाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतिहास के पन्नो पर नजर डालें तो दृष्टिगत होता है कि चाणक्य ने एक अखण्ड भरत का सपना देखा था जिसे वह चंद्रगुप्त जैसे युवा के माध्यम से से ही साकार कर सका था। पराधीन भारत में भी युवा शक्ति की नैतिक, आध्यात्मिक और सृजनात्मक शक्ति को जागृत करने का स्वामी विवेकानन्द  का विश्वविख्यात व्याख्यान ’उठो जागो‘ भी युवा शक्ति को ही समर्पित था। विवेकानन्द की दृष्टि से महात्मा गंाधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर,जैसे महापुरूषों ने युवाओं को देखा था और उन्हे राष्ट्र और समाज के लिए प्रेरित किया था। आजाद भारत में युवा शक्ति को संपूर्ण क्रान्ति का आधार बनाने के लिए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के प्रयास भी कम नहीं रहे। वे संपूर्ण क्रंाति के एक चरण अर्थात सत्ता परिवर्तन में सफल भी हुए। उनकी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी युवाओं में उनके विश्वास का द्योतक थी।
       लेकिन आज प्रश्न यह है कि युवा शक्ति को संभालने और दिशा देने की सामथ्र्य किसमे है जबकि  वर्तमान भारतवर्ष में 13 से 35 वर्ष की आयु वाले लगभग 42 करोड़ यूवाओं की मानवीय पूँँजी है जो कि दुनिया के किसी भी अन्य देश की तुलना में बहुत अधिक है अर्थात हमारा देश इन दिनो सर्वाधिक युवा देश है जिसमें से 70 प्रतिशत (लगभग 29 करोड़) ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करते हैं। गाॅव में रहने वाले युवाओं तथा  शहरों में निवास करने वाले लगभग 13 करोड़ युवा दोनो के रहन-सहन, क्षमता, रूचि, परिवेश, शिक्षा आदि एकदम अलग है। गाॅवो की शिक्षा व्यवस्था और शहरों की सुविधाए, दोनो में जमीन-आसमान का फर्क है। इसलिए ग्रामीण युवाओं को आज शिक्षा एवं रोजगाार के पर्याप्त अवसर प्राप्त नही हो पा रहे हैं और वे विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे हैं। जबकि किसी भी राष्ट्र की युवा शक्ति उसके रचनात्मक कार्यो का आधार होती है परन्तु जब युवाओं को अपनी योग्यता व शक्ति का सदुपयोग करने का अवसर नही मिलता तो वह अपने वास्तविक मार्ग से भटक जाते हैं। ऐसी परिस्थितियों में युवा शक्ति रचनात्मक कार्यो में व्यस्त न रहकर विध्वंसक कार्यो की ओर अग्रसर होतीे है।
आज हमारे देश में ग्रामीण युवा शक्ति के सामने अनेक गम्भीर चुनौतियां हैं जिनमें आर्थिक विषमता, मूल्यरहित शिक्षा, शिक्षा का रोजगारोन्मुखी न होना, उचित मार्गदर्शन का अभाव एवं टेलीवीजन के द्वारा सेक्स और हिंसा का ग्लैमराइजेशन किया जाना आदि हैं। जिसके कारण उत्पन्न अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई, बेरोजगारी, सामाजिक रिश्तों का अभाव, पारिवारिक विघटन, उपभोगवादी संस्कृति का प्रसार, टूटते सामाजिक-राजनैतिक मूल्यों ने इन युवाओं के भीतर निराशा पैदा कर दी है। आज हमारे देश में उचित मार्गदर्शन के अभाव में भारतीय युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित है और कुप्रवृत्तियों की पगडंडियो में भटककर अपराध और आतंकवाद पर चल रही है। कश्मीर में जारी आतंकवादी गतिविधियों तथा देश के कोने-कोने में पैर पसारते नक्सलवाद में गुमराह युवा वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसके अतिरिक्त देश की बढ़ती जनसंख्या ने भी युवा वर्ग को दिशा से भटकने के लिए मजबूर कर दिया है। इन समस्याओं का निदान किए बिना युवा शक्ति को राष्ट्रª विकास के कार्यो से संलग्न कर पाना संभव न हो सकेगा।
   
ऽ    आर्थिक विषमता भी युवाओं को मार्ग से भटकाने में प्रेरक तत्व है। आज देश में अधिकांश पूँँजी चंद हाथों में है जबकि अधिकांश ग्रामीण युवा निर्धन व अशिक्षित  परिवारों से संबन्धित है। धन के अभाव में ये ग्रामीण युवक शिक्षा प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं और इनकी प्रतिभा को उचित अवसर नहीं प्राप्त हो पाता है। इसके अतिरिक्त देश की जनसंख्या में तीव्र वृद्धि हो रही है। कृषि योग्य भूमि बढ़ते परिवारों के साथ टुकड़ों में बंटती जा रही है। कृषि से जीवन-यापन संभव नहीं रह गया है। फलस्वरूप युवा वर्ग ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करने पर मजबूर है। शहरो में आकर ये युवक मजदूरी कर अपना पेट भरते हैं। जहाँँ पर वे शहरी चकाचैंध से परिचित होते है और भौतिक सुखसुविधाओं की प्राप्ति हेतु गलत रास्तों पर चल पड़ते हैं।

ऽ      वर्तमान शिक्षा युवाओं को परिश्रम से दूर करती है। अल्प शिक्षा प्राप्त ये युवक कृषि व संबन्धित कार्य करने में शर्मिन्दगी महसूस करते है। “थोड़ा पढ़ा तो गया हल से, ज्यादा पढ़ा तो गया घर से “ कहावत इन पर चरितार्थ होती है। ये युवक कृषि के बजाए नौकरी प्राप्त करने में अपने भविष्य को अधिक सुरक्षित महसूस करते हैं। जिन युवकों की ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार प्राप्त होता है, वे जल्द से जल्द शहरी क्षेत्रों में स्थानान्तरण कराने का प्रयास करते हैं ताकि शहरी जीवन का लाभ उठा सकें।


ऽ      वर्तमान शिक्षा युवाओं में नैतिक मूल्यों का विकास करने में असफल सिद्ध हो रही है। शिक्षा एक व्यवसाय नहीं, वरन् संस्कार है। परंतु आज की शिक्षा व्यवसाय ज्यादा नजर आती है। युवा वर्ग कालेजो के माध्यम से ही दुनिया को देखता है। पर शिक्षा में सामाजिक व नैतिक मूल्यों का अभाव होने के कारण वह न तो उपयोगी प्रतीत होती है और न ही युवा वर्ग इसमें  कोई खास रूचि लेता है। शिक्षा का सीधा संबंध नौकरी या रोजगार से जुड़ गया है। ऐसे में शिक्षा की व्यावहारिक उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न लगने लगाा है।ऐसे में युवा वर्ग की सक्रियता हिंसात्मक कार्यौ, उपद्रव , हड़तालों, अपराधों और अनुशासनहीनता के रूप में ही दिखाई देती है। शिक्षा में सामाजिक व नैतिक मूल्यों के अभाव ने युवाओं को नैतिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन की ओर अग्रसर किया है।मसलन मादक द्रव्यों व धू्रमपान की आदतें, यौन शुचिता का अभाव आदि ने विद्यालयों को विद्यास्थल के बजाए राजनीतिक अखाड़ा, असामाजिक व अनैतिक कार्यौ की जन्मस्थली बना दिया है। दुर्भाग्यवश आज के गुरूजन भी प्रभावी रूप् में सामाजिक व नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में असफल रहे।

ऽ      युवाओं के समक्ष एक अन्य चुनौती उचित मार्गदर्शन का अभाव है। आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर जब नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या? किसी दौर में युवाओं  के आदर्श गांधी, नेहरू, विवेकानन्द, आजाद, सुभाष जैसे लोग या उनके आसपास के सफल व्यक्ति, वैज्ञानिक और शिक्षक रहे। पर आज के युवाओं के आदर्श वही हैं जो शार्टकट के माध्यम से ऊॅचाइयों पर पहुॅच जाते हैं। फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियां, विश्वसुन्दरियां, भ्रष्ट अधिकारी, उद्योगपति, राजनीतिज्ञ और अपराध जगत के डान आदि उनके आदर्श बन गए हैं। फलस्वरूप अपनी संस्कृति के प्रतिमानो और उद्यमशीलता को भूलकर रातोरात ग्लैमर की चकाचैंध में वे शीर्ष पर पहुॅचना चाहते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि जिस प्रकार एक हाथ से ताली नहीं बज सकती, उसी प्रकार बिना उद्यम के ठोस कार्य भी नहीं हो सकता। कभी देश की आजादी में युवाओं ने अहम भूमिका निभाई और जरूरत पड़ने पर नेतृत्व भी किया। कभी विवेकानन्द जैसे व्यक्तित्व ने युवा कर्मठता का ज्ञान दिया तो सन् 1977 में लोकनायक जयप्रकाश के आह्नान पर सारे देश के युवा एक होकर सड़कों पर निकल आए। पर आज वही युवा अपनी शक्तियों को भूलकर चन्द लोगो के हाथ का खिलौना बन गए हैं और भ्रष्ट व्यक्तियों को आदर्श मानकर गलत रास्तों पर चल पड़े हैं।

ऽ      आज का युवा संक्रमण काल से गुजर रहा है। वह अपने बलबूते पर आगे बढ़ना चाहता है, पर परिस्थितियां और समाज उसका साथ नहीं देते। चाहे वह राजनीति हो, फिल्म व मीडिया जगत हो, शिक्षा हो, उच्च नेतृत्व हो, हर किसी ने उसे सुक्षद जीवन के सपने दिखाये और उसको भॅवर में छोड़ दिया। ऐसे में पीढि़यों के बीच जनरेशन गैप भी बढ़ा है। समाज की कथनी-करनी में भी जमीन-आसमान का अन्तर है। एक तरफ वह सभी को डिग््राीधारी देखना चाहता है, पर उन सबको रोजगार उपलब्ध नहीं करा पाता। नतीजन निर्धनता, मंहगाई, भ्रष्टाचार इन सभी की मार सबसे पहले युवाओं पर पड़ती है। इसी प्रकार व्यावहारिक जगत में आरक्षण, भ्रष्टाचार, स्वार्थ, भाई-भतीजावाद और कुर्सी की लालसा जैसी चीजों ने युवा हृदय को झकझोर दिया है। ज बवह देखता है कि योग्यता और ईमानदारी से कार्य संभव नहीं है, तो कुण्ठाग्रस्त होकर वह गलत रास्ते पर चल पड़ता है। निश्चित रूप से ऐसी स्थिति में ही समाज के दुश्मन उसकी भावनाओं को भड़काकर व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह के लिए पे्ररित करते हैं। फलतः अपराध और आतंकवाद का जन्म होता है।


ऽ      युवाओं को प्रभावित करने में फिल्मी दुनिया  और विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ रहा है, पर इसके सकारात्मक तत्वों के बजाए इसके नकारात्मक तत्वों ने ही युवकों को ज्यादा प्रभावित किया है। फिल्मी पर्दे पर हिंसा, बलात्कार, प्रणय दृश्य, यौन उच्छ्श्रंखलता एवं रातांेरात अमीर बनने के दृश्यों को देखकर आज का युवा उसी जिन्दगी को वास्तविक रूप में जीना चाहता है। फिल्मी पर्दे पर पहने जाने वाले अधोःवस्त्र ही आधुनिकता का पर्याय बन गए हैं। वास्तव में पर्दे का नायक आज के युवा की कुण्ठाओं का विस्फोट है। पर युवा वर्ग यह नहीं सोचता कि पर्दे की दुनिया वास्तविक नही हो सकती। पर्दे पर अच्छा काम करने वाला नायक वास्तविक जिन्दगी में खलनायक भी हो सकता है।

                   आज समाज और राष्ट्र के बिखरे हुए ऊर्जा के स्रोत युवाओं को संगठित और अनुशासित करके उनकी ऊर्जा को किसी सकारात्मक लक्ष्य और समाज उत्थान के कार्य हेतु अगर प्रयोग में लिया गया तो यह युवा शक्ति हर लक्ष्य को भेदती हुई सफलता के नए आयाम गढ़कर देश और समाज को हिमालय की बुलंदियों तक पहुचा सकेगें। इसके लिए उचित शिक्षा, सही मार्गदर्शन एवं अभिभावक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ताओं व सरकारी तंत्र के पारस्परिक समन्वय की महती आवश्यकता है। अतएव शिक्षा को रोजगारपरक, हिंसामुक्त, क्रियाशील, मूल्यपरक एवं प्रकृति से सम्बन्धित करके ही निर्भय, स्वानुशासित, अहिंसात्मक जीवन दृष्टि वाले, आत्मनिर्भर, सहकारप्रिय एवं गीता में वर्णित ‘आत्मन्येवात्मना तुष्टः’ (अपने भीतर स्वयं से तृप्त) युवाओं का निर्माण किया जा सकता है। ऐसे युवकों के द्वारा ही देश में सामाजिक सौहार्द्र ,सुख-शान्ति व समृद्धशाली समाज की स्थापना की जा सकती है जिसके द्वारा ही आधुनिक सभ्यता के उज्जवल भविष्य का सपना साकार हो सकेगा।
  


ज्योति पर्व दीपावली

आप सभी को ज्योति पर्व दीपावली पर हार्दिक             शुभकामनाएं

Monday, September 17, 2012

महिला सशक्तीकरण में शिक्षा की भूमिका

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Monday, July 9, 2012

gijubhai ka komal hridaya


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