Saturday, January 5, 2013
Saturday, December 22, 2012
ओशो शिक्षा का अर्थ

शिक्षा का अर्थ
ओशो
शिक्षा का अर्थ
जीवन मिलता नहीं है,
निर्मित करना होता है।
जन्म मिलता है,
जन्म मिलता है,
जीवन निर्मित करना होता है।
इसीलिए मनुष्य को शिक्षा की जरूरत है।
शिक्षा का एक ही अर्थ है
इसीलिए मनुष्य को शिक्षा की जरूरत है।
शिक्षा का एक ही अर्थ है
कि हम
जीवन की कला सीख सकें।
सुख आज है,
जीवन की कला सीख सकें।
सुख आज है,
और अभी हो सकता है।
लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति के लिए
हो सकता है,
लेकिन सिर्फ उस व्यक्ति के लिए
हो सकता है,
जो भविष्य की आशा में नहीं,
वर्तमान की कला में जीने का रहस्य समझ लेता है।
तो मैं शिक्षित उसे कहता हूँ
तो मैं शिक्षित उसे कहता हूँ
जो आज जीने में
समर्थ है- अभी और यहीं।
समर्थ है- अभी और यहीं।
लेकिन इस अर्थ में
तो शिक्षित आदमी बहुत कम रह जायेंगे।
असल में हम पंडित आदमी को शिक्षित
कहने की भूल कर लेते हैं।
असल में हम पंडित आदमी को शिक्षित
कहने की भूल कर लेते हैं।
जो पढ़-लिख लेता है,
उसे हम शिक्षित कह देते हैं !
पढ़ने-लिखने से शिक्षा का कोई संबंध नहीं है। --- ओशो
(शिक्षा में क्रान्ति से)
Friday, December 21, 2012
कविताएँ अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध
कविताएँ
अयोध्या सिंह
उपाध्याय हरिऔध
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कविताएँ भवानी प्रसाद मिश्र

कविताएँ
भवानी
प्रसाद मिश्र
बेदर्द
मैंने निचोड़कर दर्द
मन को
मानो सूखने के ख्याल से
रस्सी पर डाल दिया है
और मन
सूख रहा है
बचा-खुचा दर्द
जब उड़ जायेगा
तब फिर पहन लूँगा मैं उसे
माँग जो रहा है मेरा
बेवकूफ तन
बिना दर्द का मन !
मैंने निचोड़कर दर्द
मन को
मानो सूखने के ख्याल से
रस्सी पर डाल दिया है
और मन
सूख रहा है
बचा-खुचा दर्द
जब उड़ जायेगा
तब फिर पहन लूँगा मैं उसे
माँग जो रहा है मेरा
बेवकूफ तन
बिना दर्द का मन !
Tuesday, December 18, 2012
सूक्तियाँ रामधारी सिंह दिनकर
सूक्तियाँ
रामधारी सिंह दिनकर | ||
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Monday, December 17, 2012
महात्मा गांधी की बुनियादी शिक्षा
महात्मा गांधी
की
बुनियादी शिक्षा
वर्धा शिक्षा योजना शैक्षिक
सुधार की एक ऐसी योजना थी, जो
महात्मा गांधी के शैक्षिक विचारों पर आधारित थी। इसे बुनियादी शिक्षा
या नई तालीम के नाम से भी जाना जाता है।
जब वर्धा में बुनियादी शिक्षा का मसौदा बन रहा था तो वहाँ जाकिर
हुसैन, के0टी0 शाह, आचार्य कृपलानी, आशा देवी आदि अनेक लोग मौजूद
थे। बापू ने पूछा, “ केटी, अपने बच्चों के लिए कैसी शिक्षा तैयार कर रहे हैं ?
सब चुप थे। फिर केटी ने पूछा, बापू आप ही बताये ना कैसी शिक्षा हो ?’
बापू ने कहा, ‘केटी, अगर मै किसी कक्षामें जाकर यह पूँछू कि मैने एक
सेब चार आने का खरीदा और उसे एक रुपये में बेच दिया तो मुझे क्या
मिलेगा। मेरे इस प्रश्न के जबाब में अगर पूरी कक्षा यह कह दे कि आपको
जेल की सजा मिलेगी तो मानूँगा कि यह आजाद भारत के बच्चों की सोच
के मुताबिक शिक्षा है।” बापू के इस सवाल पर सब दंग थे। वास्तव में
किसी व्यापारी को यह हक नहीं है कि वह चार आने की चीज पर बारह आने
लाभ कमाये। इस तरह इस प्रश्न के माध्यम से नैतिक शिक्षा का एक संदेश
बापू ने बिना बताये ही दे दिया। अब कौन कह सकता है कि बापू एक
महान संत, दार्शनिक और राष्ट्रीय नेता होने के साथ शिक्षाविद ही थे।
“हमारी बुनियादी शिक्षा पद्धति मस्तिष्क, शरीर और आत्मा तीनों का
विकास करती है। साधारण शिक्षा पद्धति केवल मस्तिष्क के विकास पर ही
बल देती है। नई तालीम कातने और झाड़ू देने तक ही सीमित नहीं है। ये
अति आवश्यक ही क्यों न हो यदि इनसे उक्त तीनों शक्तियों का
सामंजस्ययुक्त विकास नहीं होता तो इसका कोई मूल्य नहीं है।”
- महात्मा गांधी
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